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'हर महीने रेलवे स्टेशनों पर रिकवर होते हैं 400 लावारिस बच्चे'

Sat, 11 Aug 2018 09:15 PM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
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कार्यक्रम को सम्बोधित करते डीजीपी ओम प्रकाश सिंह। - फोटो : amar ujala
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रेलवे स्टेशनों पर रहने वाले अधिकतर लावारिस बच्चे अपराध की दुनिया में शामिल हो जाते हैं। ऐसे में इन लावारिस बच्चों को न सिर्फ रेस्क्यू किया जाए बल्कि उनकी सही देखभाल और निगरानी भी की जाए ताकि वे आपराधिक घटनाओं में शामिल न हों। ये बातें शनिवार को यूपी 100 भवन में राजकीय रेलवे पुलिस (जीआरपी) की ओर से आयोजित राज्य स्तरीय कॉन्फ्रेंस ‘नन्हे मुसाफिर’ में वक्ताओं ने कहीं। कार्यक्रम में जीआरपी के साथ आरपीएफ, रेलवे के टीटी और तमाम एनजीओ के लोगों ने रेलवे स्टेशनों पर मिलने वाले लावारिस बच्चों की सुरक्षा और देखभाल पर चर्चा की।

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कॉन्फ्रेंस का उद्घाटन करते हुए डीजीपी ओम प्रकाश सिंह ने कहा कि बच्चों से संबंधित मामलों में सिर्फ कानून जान लेने से कुछ नहीं होगा। हमें विशेषज्ञता हासिल कर प्रोफेशनल तरीके से इससे निपटना होगा और कानूनों के अनुरूप खुद को ढालना होगा। पुलिस की जिम्मेदारी इसलिए भी बढ़ जाती है कि बच्चों को अपने अधिकारों के बारे में जानकारी नहीं होती इसके लिए कई स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर बनाया गया है जिसका पुलिस कर्मियों के साथ-साथ सभी संबंधित लोगों को पालन करना चाहिए।

उन्होंने कहा कि लावारिस बच्चों को उनके माता-पिता से मिलाने के लिए पुलिस ने ऑपरेशन मुस्कान और ऑपरेशन आत्मरक्षा जैसे अभियान चलाए जिनका अच्छा रिस्पांस मिला। पुलिस की जिम्मेदारी बड़ी होती है कि कोई बच्चा या बच्ची मिलती है तो उसको सुरक्षित तरीके से संरक्षण गृह तक पहुंचाया जाए। अगर विशेष सावधानी नहीं बरती जाए तो देवरिया कांड जैसी घटनाएं सामने आती हैं।

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हर महीने रिकवर होते हैं 400 बच्चे

एडीजी रेलवे वीके मौर्य ने कहा कि यूपी के 1190 रेलवे स्टेशनों से 1597 ट्रेनें रोजाना गुजरती हैं। इन ट्रेनों में 15 लाख यात्री सफर करते हैं। पिछले सवा साल में लगभग 5100 से अधिक बच्चे लावारिस हालत में ट्रेनों में या स्टेशनों पर मिले हैं। इन बच्चों को रेलवे चाइल्ड लाइन और अन्य एनजीओ के माध्यम से रेस्क्यू किया गया है।

14 साल की उम्र पूरी करते ही स्टेशनों से लापता हो जाती हैं लड़कियां
एहसास एनजीओ की संचालिका शचि सिंह ने बताया कि बहुत से बच्चे ऐसे होते हैं जिनका घर-द्वार रेलवे स्टेशन ही होता है। ऐसे बच्चे पहले भीख मांगते हैं और फिर आपराधिक घटनाओं में शामिल हो जाते हैं। ऐसी लड़कियां जो आठ से 10 साल की उम्र में स्टेशन पर आती हैं, वे 14 साल की उम्र पूरी होते ही गायब हो जाती हैं।

चेतना संस्था के संजय गुप्ता के साथ ही साथी संस्था के लोगों ने भी अपने काम और जिम्मेदारियों के बारे में बताया। आईआरसीटीसी के रीजनल हेड अश्वनी श्रीवास्तव ने इसे अच्छी पहल बताया और उम्मीद जाहिर की कि आने वाले दिनों में इसका असर दिखेगा।
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