निकाय चुनावों में बेहतर नतीजों की उम्मीदें संजोए रखने वाली समाजवादी पार्टी को करारा झटका लगा है। अपने गढ़ों में सपा को करारी हार का सामना करना पड़ा है। नगर निगमों में तो सपा का खाता ही नहीं खुल पाया। 16 नगर निगमों में सपा केवल 5 में ही दूसरे नंबर पर रही।
बसपा के दलित-मुसलिम गठजोड़ और ओवैसी के एआईएमआईएम की आहट भी सपा के लिए खतरे का संकेत है। चुनाव परिणामों ने सपा को संदेश भी दे दिया है, सीखने के लिए सबक भी।
सपा ने इस बार नगर निकाय चुनावों को 2019 की तैयारी का रिहर्सल मानकर लड़ी थी। उसका पूरा जोर शहरों में नोटबंदी और जीएसटी से चलते भाजपा के प्रति व्यापारियों की नाराजगी को भुनाने पर था। इसीलिए कई नगर निगमों में व्यापारी वर्ग से जुड़े कई प्रत्याशी उतारे। उसे उम्मीद थी कि विधानसभा चुनाव की तरह मुस्लिम मतों के बहुमत का रुझान उसकी तरफ रहेगा।
लेकिन, ऐसा नहीं हुआ। पश्चिमी यूपी में मेरठ, अलीगढ़, सहारनपुर समेत कई बड़े शहरों में मुस्लिमों ने बसपा पर ज्यदा भरोसा जताया। इसका असर नतीजों में भी दिखा। यह सपा के लिए अच्छा संकेत नहीं माना जा रहा है। हालांकि चुनाव के दौरान मुलायम सिंह ने कहा कि सपा ने हमेशा मुसलमानों का साथ दिया लेकिन कई निकायों में वे सपा को छोड़ बसपा के पक्ष में खड़े दिखाए दिए।