उपचुनाव में अकेले दम पर उतरी बहुजन समाज पार्टी के लिए दलित वोट बैंक के बिखराव को रोक पाना मुश्किल हो रहा है। पार्टी के तमाम प्रयासों के बावजूद दलिताें का रुझान अन्य दलों की तरफ दिखाई पड़ रहा है। भाजपा, कांग्रेस और सपा के बाद अब आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) भी बसपा को उपचुनाव में नुकसान पहुंचाने की जुगत में है।
बता दें कि बसपा का वोट बैंक बीते एक दशक के दौरान आधा हो चुका है। इसकी मुख्य वजह भाजपा रही, जिसने 2017 के विधानसभा चुनाव में बसपा के वोट बैंक में गहरी सेंध लगाई थी। हालांकि वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में सपा के साथ मिलकर चुनाव लड़ने से बसपा को फायदा हुआ था और उसके 10 प्रत्याशी जीतकर सांसद बने थे।
इसके बाद बसपा ने दोबारा अकेले चुनाव लड़ने का फैसला लिया। वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव और वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में उसका यह फैसला गलत साबित हुआ और वोटरों ने दोबारा अन्य दलों में विकल्प तलाशना शुरू कर दिया।
वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में आजाद समाज पार्टी के अध्यक्ष चंद्रशेखर आजाद ने बसपा से नगीना सीट छीन ली। वहीं पार्टी को वर्ष 2014 के चुनाव की तरह किसी भी सीट पर जीत हासिल नहीं हुई। इसकी मुख्य वजह दलित वोटरों का बसपा से मोहभंग होना माना जा रहा है। अब देखना यह है कि लगातार एससी-एसटी आरक्षण के उपवर्गीकरण का विरोध कर रही बसपा का साथ दलित वोटर देंगे कि नहीं।