न्यास में 11 मनोनीत और 7 पदेन सदस्य होंगे। मनोनीत सदस्यों में वैष्णव परंपराओं, संप्रदायों व पीठों से 3 प्रतिष्ठित सदस्य होंगे। इनमें साधु-संत, मुनि, गुरु, विद्वान, मठाधीश, महंत, आचार्य और स्वामी शामिल हो सकते हैं। सनातन धर्म की परंपराओं, संप्रदायों व पीठों से 3 सदस्य, सनातन धर्म की किसी भी शाखा या संप्रदाय से 3 सदस्य होंगे। ये प्रतिष्ठित व्यक्ति, शिक्षाविद, विद्वान, उद्यमी, वृत्तिक व समाजसेवी होंगे। गोस्वामी परंपरा से 2 सदस्य होंगे। इनमें स्वामी हरिदासजी के वंशज के राज-भोग सेवादारों और शयन-भोग सेवादारों का एक-एक प्रतिनिधि होगा। इनका कार्यकाल 3 वर्ष का होगा।
पदेन सदस्य में मथुरा के जिला मजिस्ट्रेट, वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक, नगर निगम आयुक्त, उत्तर प्रदेश ब्रज तीर्थ क्षेत्र विकास परिषद के सीईओ, बांके बिहारी मंदिर ट्रस्ट के सीईओ और राज्य सरकार का नामित प्रतिनिधि शामिल होंगे। यदि कोई पदेन सदस्य सनातन धर्म को नहीं मानने वाला या गैर-हिंदू हुआ, तो उसकी जगह उससे कनिष्ठ अधिकारी को नामित किया जाएगा।
न्यास की बैठक हर तीन महीने में अनिवार्य होगी। बैठक के आयोजन से 15 दिन पहले नोटिस देना होगा। बोर्ड या सदस्य सद्भावनापूर्वक किए गए कार्यों के लिए उत्तरदायी नहीं ठहराए जाएंगे। न्यास को 20 लाख रुपये तक की चल व अचल संपत्ति स्वयं खरीदने का अधिकार होगा। इससे अधिक के लिए सरकार की स्वीकृति आवश्यक होगी। मुख्य कार्यपालक अधिकारी (सीईओ) एडीएम स्तर के अधिकारी होंगे। यह विधेयक मंदिर की धार्मिक परंपरा की रक्षा करते हुए प्रशासन को संस्थागत बनाता है और श्रद्धालुओं को अच्छे अनुभव देने का रोडमैप प्रस्तुत करता है।
न्यास गठन का उद्देश्य मंदिर की संपत्तियों को अपने अधीन करना नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि व्यय जवाबदेह तरीके से किया जाए। न्यास की स्थापना का उद्देश्य राज्य सरकार द्वारा मंदिर की धार्मिक एवं सांस्कृतिक परंपराओं में हस्तक्षेप करना नहीं है। सरकार किसी भी धार्मिक पहलू में हस्तक्षेप नहीं करेगी।
शासन के उच्चपदस्थ सूत्रों के मुताबिक, दोनों सदनों में उत्तर प्रदेश श्री बांके बिहारी जी मंदिर न्यास विधेयक पास होने के बाद भी इसके तहत ट्रस्ट का गठन नहीं हो सकेगा। ट्रस्ट के गठन के बाबत कोई भी निर्णय इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला आने के बाद ही हो सकेगा।
यहां बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में वृंदावन स्थित बांके बिहारी मंदिर के रोजमर्रा के कामकाज और पर्यवेक्षण के लिए इलाहाबाद हाईकोर्ट के पूर्व जज जस्टिस अशोक कुमार की अध्यक्षता एक उच्चाधिकार प्राप्त समिति का गठन किया। यह समिति तब तक मंदिर प्रबंधन का कामकाज देखेगी, जब तक यूपी सरकार के अध्यादेश मुद्दे पर इलाहाबाद हाईकोर्ट अपना फैसला नहीं सुना देता।