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UP: राजधानी में एक और फर्जी कॉल सेंटर का खुलासा, अमेरिकी नागरिकों को ठगने वाले सात लोग अरेस्ट

Fri, 17 Jul 2026 06:50 PM IST
Akash Dwivedi अमर उजाला नेटवर्क, लखनऊ

सार

लखनऊ पुलिस ने सुशांत गोल्फ सिटी में संचालित फर्जी कॉल सेंटर का भंडाफोड़ कर सात आरोपियों को गिरफ्तार किया। आरोपी माइक्रोसॉफ्ट कर्मी बनकर अमेरिकी नागरिकों को साइबर ठगी का शिकार बनाते थे। गिरोह डराकर बैंक विवरण और गिफ्ट कार्ड हासिल करता था। पुलिस मामले की विस्तृत जांच कर रही है।
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फर्जी कॉल सेंटर पकड़ा। - फोटो : अमर उजाला नेटवर्क
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विस्तार
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क्राइम ब्रांच और साइबर सेल की टीम ने अमेरिकी नागरिकों से ठगी करने वाले एक और फर्जी कॉल सेंटर का पर्दाफाश किया है। कॉल सेंटर सुशांत गोल्फ सिटी इलाके में स्थित ओमेक्स आर 2 रेजिडेंशियल अपार्टमेंट में संचालित किया जा रहा था। पुलिस ने गिरोह में शामिल सात लोगों को गिरफ्तार किया है। आरोपी माइक्रोसॉफ्ट कंपनी कर्मी बनकर विदेशी नागरिकों को जाल में फंसाते थे।

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डीसीपी क्राइम अनिल कुमार यादव के मुताबिक ऑपरेशन साई वज्र के तहत गिरोह का भंडाफोड़ किया गया है। गिरोह का संचालन अहमदाबाद निवासी पुनीत कुमार वर्मा और दीपेन चंद्र कांत पटेल कर रहे थे।  इनके साथियों कोलकाता निवासी मो. सोहेल, मो. शहनवाज, मो. इमरान, मो. रियाज और सज्जाद हुसैन को भी गिरफ्तार किया गया है। आरोपियों ने दो फ्लैट किराए पर ले रखा था। एक में सभी रहते थे और दूसरे में कॉल सेंटर का संचालन किया जा रहा था। गिरोह दो माह पहले ही राजधानी में शिफ्ट हुआ था। इसके पहले सभी कोलकाता में फर्जी कॉल सेंटर संचालित कर रहे थे। 




 

गिरोह के लोग ऐसे करते थे काम

छानबीन में सामने आया है कि गिरोह तकनीकी संसाधनों एवं इंटरनेट आधारित कॉलिंग प्लेटफॉर्म का उपयोग कर साइबर ठगी कर रहा था। इनमें खासकर वॉइस ओवर इंटरनेट प्रोटोकॉल कालिंग का इस्तेमाल किया जाता था। अमेरिका में बैठे ठग पहले विदेशी नागरिकों का डाटा प्राप्त करते थे। इसके बाद वे पीडितों के लैपटॉप, कंप्यूटर में वायरस भेजकर पॉपअप जनरेट कराते थे। इससे इनके टोल फ्री नंबर प्रदर्शित होते थे। 

पीड़ित के कॉल करने पर वहां बैठे ठग उनसे माइक्रोसॉफ्ट सपोर्ट व साइबर सिक्योरिटी का प्रतिनिधि बनकर बातचीत करते थे। डीसीपी ने बताया कि ठग लोगों को यह विश्वास दिलाते थे कि उनके बैंक खाते, डिजिटल वॉलेट, ऑनलाइन भुगतान व व्यक्तिगत पहचान से संबंधित गंभीर समस्या हो गई है। ऐसे में आपके खिलाफ वित्तीय या कानूनी कार्रवाई की जा सकती है। पीड़ित जब डर जाता था तो कॉल को लखनऊ में सक्रिय गिरोह के पास स्थानांतरित किया जाता था। 

 

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इस तरह फंसाते थे

इसके बाद गिरोह खुद को साइबर सिक्योरिटी या फेडरल ट्रेड कमिशन का अफसर बताकर बात करता था। लोगों को डराकर उन्हें जेल भेजने की धमकी दी जाती थी। इसके बाद गूगल से एडिट कर जाली दस्तावेज तैयार करते थे और लोगों को भेज देते थे। आरोपियों के बनाए गए दस्तावेज बिल्कुल सरकारी अभिलेखों के जैसे होते थे, जिससे पीड़ित आसानी से धोखे में आ जाए।

सबको बांट रखा था अलग-अलग काम

एडीसीपी क्राइम किरन यादव ने बताया कि फर्जी कॉल सेंटर का संचालन सुव्यवस्थित तरीके से हो रहा था। प्रत्येक कर्मचारी को उसकी भूमिका के हिसाब से काम बांटा गया था। एक टीम पीडितों के लैपटॉप या कंप्यूटर का एक्सेस लेकर उनके बैंक खातों का डिटेल ले लेती थी।  इसके बाद वालमार्ट व अमेजन का गिफ्ट कार्ड खरीद लेते थे। यही हीं जिस पीड़ित से बड़ी धनराशी हासिल करनी होती थी उनसे अमेरिका में बैठे ठग पार्सल मंगवा लेते थे। कई बार वे सीधे पीड़ित से मिलकर नकदी या सोना लेते थे।
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