गिरोह के लोग ऐसे करते थे काम
छानबीन में सामने आया है कि गिरोह तकनीकी संसाधनों एवं इंटरनेट आधारित कॉलिंग प्लेटफॉर्म का उपयोग कर साइबर ठगी कर रहा था। इनमें खासकर वॉइस ओवर इंटरनेट प्रोटोकॉल कालिंग का इस्तेमाल किया जाता था। अमेरिका में बैठे ठग पहले विदेशी नागरिकों का डाटा प्राप्त करते थे। इसके बाद वे पीडितों के लैपटॉप, कंप्यूटर में वायरस भेजकर पॉपअप जनरेट कराते थे। इससे इनके टोल फ्री नंबर प्रदर्शित होते थे।
पीड़ित के कॉल करने पर वहां बैठे ठग उनसे माइक्रोसॉफ्ट सपोर्ट व साइबर सिक्योरिटी का प्रतिनिधि बनकर बातचीत करते थे। डीसीपी ने बताया कि ठग लोगों को यह विश्वास दिलाते थे कि उनके बैंक खाते, डिजिटल वॉलेट, ऑनलाइन भुगतान व व्यक्तिगत पहचान से संबंधित गंभीर समस्या हो गई है। ऐसे में आपके खिलाफ वित्तीय या कानूनी कार्रवाई की जा सकती है। पीड़ित जब डर जाता था तो कॉल को लखनऊ में सक्रिय गिरोह के पास स्थानांतरित किया जाता था।
इस तरह फंसाते थे
इसके बाद गिरोह खुद को साइबर सिक्योरिटी या फेडरल ट्रेड कमिशन का अफसर बताकर बात करता था। लोगों को डराकर उन्हें जेल भेजने की धमकी दी जाती थी। इसके बाद गूगल से एडिट कर जाली दस्तावेज तैयार करते थे और लोगों को भेज देते थे। आरोपियों के बनाए गए दस्तावेज बिल्कुल सरकारी अभिलेखों के जैसे होते थे, जिससे पीड़ित आसानी से धोखे में आ जाए।
सबको बांट रखा था अलग-अलग काम
एडीसीपी क्राइम किरन यादव ने बताया कि फर्जी कॉल सेंटर का संचालन सुव्यवस्थित तरीके से हो रहा था। प्रत्येक कर्मचारी को उसकी भूमिका के हिसाब से काम बांटा गया था। एक टीम पीडितों के लैपटॉप या कंप्यूटर का एक्सेस लेकर उनके बैंक खातों का डिटेल ले लेती थी। इसके बाद वालमार्ट व अमेजन का गिफ्ट कार्ड खरीद लेते थे। यही हीं जिस पीड़ित से बड़ी धनराशी हासिल करनी होती थी उनसे अमेरिका में बैठे ठग पार्सल मंगवा लेते थे। कई बार वे सीधे पीड़ित से मिलकर नकदी या सोना लेते थे।