करणी सेना को लेकर यूपी के मुख्य विपक्षी दल का रुख उसकी सोची समझी रणनीति का हिस्सा है। समाजवादी सार्वजनिक रूप से भले ही यह स्वीकार न करें कि अखिलेश सरकार के जाने में आमजन के बीच पैदा हुई उस धारणा का बड़ा हाथ था कि तत्कालीन सपा सरकार खास जाति और धर्म के लोगों को तरजीह देती है। पर, हार के आत्म विश्लेषण में इसे बखूबी स्वीकार करते हैं। समाजवादियों का मानना है कि करणी सेना के रूप में वैसा ही हथियार अब सत्ता पक्ष ने भी उन्हें मुहैया करा दिया है। वे आमजन के बीच इस बात को प्रमुखता से उठा रहे हैं कि आखिर करणी सेना के लोगों को फंडिंग कहां से हो रही है। उनकी पूरी कोशिश है कि करणी सेना के बहाने वे जाति विशेष बनाम पीडीए (पिछड़े, दलित व अल्पसंख्यक) के मुद्दे को हवा दे सकें।
रामजी लाल सुमन जाटव बिरादरी से हैं, यह जाति अब भी बसपा का मजबूत जनाधार मानी जाती है। इसके लिए डॉ. आंबेडकर ईश्वर से कम नहीं हैं। इस पूरे संघर्ष के जरिये सपा की नजर मायावती के बचे वोटबैंक पर भी है। एक-दूसरे में समाया हुआ डॉ. आंबेडकर और अखिलेश का चित्र सपा की यही रणनीति स्पष्ट कर रहा है। लोकसभा चुनाव के परिणाम इस रणनीति की झलक दे चुके हैं। अब यह तो सत्ताधारी भाजपा को देखना है कि वो करणी सेना और रामजीलाल सुमन के मामले को कैसे हैंडल करती है और सपा के इस प्रयोग का क्या जवाब ढूंढती है।