प्रदेश में डिप्लोमा इन ऑडियो एंड स्पीचथेरेपी, डिप्लोमा इन ब्लड ट्रांसफ्यूजन, डिप्लोमा इन प्लास्टिक सर्जरी, डायलिसिस टेक्नीशियन, इमरजेंसी एंड ट्रामा केयर टेक्नीशियन, हॉस्पिटल रिकॉर्ड कीपिंग, डिप्लोमा इन ऑप्टोमेट्री, मिनिमल एसेस सर्जिकल टेक्नीशियन, डिप्लोमा इन सैनिटेशन, रेस्पिरेटरी टेक्नीशियन सहित करीब 36 कोर्स चल रहे हैं। इनकी करीब 22 हजार सीटें हैं। इन पाठ्यक्रमों के संचालन की मंजूरी नेशनल एलाइड एंड हेल्थकेयर काउंसिल से नहीं मिली है। ऐसे में अब इन पाठ्यक्रमों की पढ़ाई नहीं होगी। भविष्य में जब कोर्स को मंजूरी मिलेगी, तभी उसमें पढ़ाई शुरू की जाएगी। इसी तरह सर्टिफिकेट इन बेबी नर्सिंग, सर्टिफिकेट इन इमरजेंसी ट्रामा सहित दर्जनभर अन्य कोर्स हैं। इनमें भी लगभग दो हजार सीटें हैं। इन्हें भी बंद किया जा रहा है।
सरकारी नौकरी में शैक्षिक योग्यता का विवाद होगा खत्म : चिकित्सा शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि पैरामेडिकल से जुड़े डिग्री लेने के बाद छात्रों को तत्काल नौकरी मिलनी चाहिए। यही वजह है कि अब समीक्षा करके पाठ्यक्रमों को जॉब आधारित बनाया जा रहा है। उम्मीद है कि अगले वर्ष तक तमाम मशीनों के संचालन संबंधी संयुक्त पाठ्यक्रम आ जाएंगे। ऐसे में छात्रों को अलग-अलग कोर्स नहीं करने पड़ेंगे। सरकारी नौकरी में शैक्षिक योग्यता व समकक्षता को लेकर होने वाला विवाद भी खत्म होगा।
अपर मुख्य सचिव चिकित्सा शिक्षा एवं चिकित्सा एवं परिवार कल्याण अमित कुमार घोष का कहना है कि प्रदेश के छात्रों को कोर्स से जुड़ी डिग्री हासिल करने के बाद तत्काल नौकरी दिलाना प्राथमिकता है। जिस कोर्स की डिग्री लेने के बाद उसकी उपयोगिता न हो, उसे बंद किया जा रहा है।