हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने 1991 में उत्तर प्रदेश विधानसभा में कथित हंगामे से जुड़े 34 साल पुराने आपराधिक मुकदमे को रद्द कर दिया। कोर्ट ने कहा कि ऐसे पुराने और निष्प्रभावी मामलों को चलाना निरर्थक अभ्यास है और इससे न्यायपालिका पर अनावश्यक बोझ पड़ता है। अदालत ने राज्य सरकार से ऐसे लंबित मामलों की छंटनी करने को कहा।
न्यायमूर्ति पंकज भाटिया की एकल पीठ ने धारा 482 दंप्रसं के तहत दाखिल याचिकाओं को स्वीकार करते हुए मधुकर शर्मा और संजय सिंह के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही को समाप्त कर दिया। मामला विधानसभा के गेट नंबर-1 पर कथित हंगामे, जबरन प्रवेश के प्रयास और वाहनों को नुकसान पहुंचाने से जुड़ा था।
अदालत ने कहा कि एफआईआर और चार्जशीट में ऐसा कोई ठोस साक्ष्य नहीं है जिससे दंगा, लोक सेवक पर हमला या हिंसा का आरोप साबित हो सके। विधानसभा परिसर को मानव निवास न मानते हुए धारा 452 (गृह-अतिक्रमण) का आरोप भी अस्वीकार कर दिया गया। धारा 427 के तहत नुकसान का आरोप भी सिद्ध नहीं पाया गया।
कोर्ट ने यह भी माना कि मामले में आरोप पत्र दाखिल होने के 30 साल से अधिक समय बीतने के बावजूद एक भी गवाह का बयान दर्ज न होना, संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत त्वरित सुनवाई के अधिकार का उल्लंघन है। राज्य सरकार ने कोर्ट को बताया कि पुराने मामलों की पहचान और वापसी के लिए समिति गठित की गई है।
अदालत ने आशा व्यक्त की कि समिति शीघ्र ही प्रभावी समाधान प्रस्तुत करेगी जिससे राज्यभर में लंबित निरर्थक मुकदमों की छंटनी हो सके और जिला अदालतों से ऐसे मुकदमों के बोझ को हटाया जा सके। इस निर्देश के साथ कोर्ट ने लखनऊ जिला न्यायालय में लंबित इस मुकदमे की पूरी कार्यवाही को रद्द कर दिया गया।