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सुना है क्या: कील-कांटे कर रहे दुरुस्त, साथ ही 'हालात बेकाबू व खेल में कप्तान, काम में सब्स्टीट्यूट' के किस्से

Tue, 15 Sep 2026 09:16 AM IST
Bhupendra Singh अमर उजाला ब्यूरो, लखनऊ

सार

यूपी के राजनीतिक गलियारे और प्रशासन में तमाम ऐसे किस्से हैं, जो हैं तो उनके अंदरखाने के... लेकिन, चाहे-अनचाहे बाहर आ ही जाते हैं। ऐसे किस्सों को आप अमर उजाला के "सुना है क्या" सीरीज में पढ़ सकते हैं। तो आइए पढ़ते हैं इस बार क्या है खास...
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सुना है क्या/suna hai kya - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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यूपी के राजनीतिक गलियारे और प्रशासनिक गलियों में आज तीन किस्से काफी चर्चा में रहे। चाहे-अनचाहे आखिर ये बाहर आ ही जाते हैं। इन्हें रोकने की हर कोशिश नाकाम होती है। आज की कड़ी में 'सीट के लिए कील-कांटे कर रहे दुरुस्त' की कहानी। इसके अलावा 'ठौर बदलने से पहले हालात बेकाबू' और 'खेल में कप्तान, काम में सब्स्टीट्यूट' के किस्से भी चर्चा में रहे। आगे पढ़ें, नई कानाफूसी...

सीट के लिए कील-कांटे कर रहे दुरुस्त

प्रदेश में विधानसभा चुनाव करीब आता देख माननीय अपने कील-कांटे दुरुस्त करने में लग गए हैं। ऐसे में सत्ता पक्ष से जुड़े पश्चिमी प्रदेश के एक माननीय भी अभी से सुरक्षित सीट खोजने लगे हैं। चर्चा है कि वर्तमान सीट पर उनका गुणा-गणित बहुत सही नहीं चल रहा है। वहीं पार्टी में भी कईयों के टिकट कटने की चर्चा चल रही है। ऐसे में वे अभी से सुरक्षित सीट की तलाश में लग गए हैं। कहा तो यह भी जा रहा है कि हाल ही में उन्होंने इसके लिए संगठन से लेकर प्रदेश के मुखिया तक से मिलकर अपनी बात रखी है।

ठौर बदलने से पहले हालात बेकाबू

ऊर्जा विभाग के एक अफसर धीमी गति से समय काट रहे थे। उन्हें भरोसा था कि जब तक हालात बेकाबू होंगे, उनका ठौर बदल जाएगा, लेकिन हुआ एकदम उल्टा। ठौर तो नहीं बदला। हालात जरूर बदल गए। प्रदेश में ऊर्जा संकट आ गया। अब जवाब नहीं देते बन रहा है। ऐसे में वह अपने मातहतों पर ठीकरा फोड़ने में लगे हैं। लेकिन मातहत पहले से ही अलर्ट हैं। उनके एक-एक आदेश की कापी लेकर बैठे हैं। अब देखना यह है कि बेकाबू हालात किसकी बलि लेता है।

खेल में कप्तान, काम में सब्स्टीट्यूट

प्रदेश की एक बड़ी खेल एसोसिएशन के सचिव महाराज की कार्यशैली चर्चा में है। सुना है कि एसोसिएशन की जिम्मेदारी निभाने के बजाय उनकी मौजूदगी अपनी ही प्रतियोगिताओं में मुख्य अतिथि और विशिष्ट अतिथि की कुर्सी तक रहती है। एसोसिएशन का कामकाज एक कोच के भरोसे छोड़ रखा है, जो प्रदेशभर की छोटी-बड़ी खेल गतिविधियों की कमान संभाल रहा है। हां, खिलाड़ी के तौर पर महाराज का जोश बरकरार है और शौक पूरा करने को आए दिन मैदान में उतर जाते हैं। मगर जैसे ही काम की बारी आती है, जिम्मेदारी की गेंद फौरन दूसरे पाले में पहुंच जाती है। खेलना हो तो महाराज मैदान में, काम करना हो तो कोच मैदान में... वाह री व्यवस्था।

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