अल्ट्रासाउंड मशीन के दुरुपयोग पर रोक का सपना फिलहाल पूरा होता नजर नहीं आ रहा।
लिंग परीक्षण में इस्तेमाल हो रही इन मशीनों पर ट्रैकिंग डिवाइस लगाने का काम बजट ना होने से लटक गया है।
एनआरएचएम के तहत इस प्रोजेक्ट के लिए प्रदेश सरकार द्वारा मांगा गया बजट केंद्र सरकार ने फिलहाल देने से मना कर दिया है।
प्रदेश सरकार ने प्रोजेक्ट इम्प्लीमेंटेशन प्लान (पीआईपी) 2013-14 के तहत ट्रैकिंग डिवाइस के लिए चार करोड़ रुपये का प्रस्ताव केंद्र को भेजा था।
इसमें सबसे कम लिंगानुपात वाले 10 जिलों का चयन कर वहां रजिस्टर्ड अल्ट्रासाउंड मशीनों में 1000 ट्रैकिंग डिवाइस लगाई जानी थीं। इस प्रोजेक्ट में प्रति यूनिट करीब 40,000 रुपये का खर्च स्वास्थ्य विभाग को वहन करना था।
जीपीआरएस तकनीक पर काम करने वाली इस डिवाइस को लगाने का उद्देश्य लिंग परीक्षण के मामलों पर रोक लगाना था। अल्ट्रासाउंड मशीन में एक बार डिवाइस लगने के बाद इसे निकालना संभव नहीं होगा।
मशीन से ली जाने वाली हर तस्वीर का रिकॉर्ड डिवाइस की मेमोरी में सेव हो जाता है, जो जिले के अधिकारी के यहां बने सर्वर से जुड़ी होती है।
मिल चुकें हैं सकारात्मक परिणाम
लिंग परीक्षण को रोकने के लिए सबसे पहले झज्जर में इस डिवाइस का उपयोग 2011 में किया गया। यहां कुल 29 अल्ट्रासाउंड मशीनों पर यह डिवाइस लगाई गई, जिसके सकारात्मक परिणाम देखने को मिले।
स्थानीय स्वास्थ्य विभाग की एक रिपोर्ट के मुताबिक 2011 के अंत में नवजात बच्चों का लिंगानुपात 815 प्रति हजार था। ट्रैकर सिस्टम लगने के केवल दो महीने बाद नवजात बच्चों में लिंगानुपात बढ़कर 837 हो गया।
ऐसे काम करता है ट्रैकर
ट्रैकर सिस्टम एक तरह का जीपीआरएस आधारित इलेक्ट्रॉनिक सर्किट है। इसे अल्ट्रासाउंड मशीन के साथ अटैच कर दिया जाता है।
सर्किट की मदद से मशीन से ली गई हर इमेज को एनक्रिप्ट कर सर्वर में सुरक्षित कर लिया जाता है। लिंग परीक्षण होने पर आसानी से यह इमेज पकड़ में आ जाती है।
गड़बड़ी से बचने के लिए पावर बैकअप तक इस डिवाइस को मशीन से ही देने की व्यवस्था है। गड़बड़ या हटाए जाने की कोशिश पर भी डिवाइस सर्वर को अलर्ट भेज देगी।
करीब एक टेराबाइट की मेमोरी वाले सर्वर में दो महीने का डाटा सुरक्षित रह सकता है।