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केजीएमयू के डॉक्टरों ने पाई कामयाबी, इस जानलेवा फंगस से बचाई दो मरीजों की जान

Mon, 14 Oct 2019 04:42 PM IST
लखनऊ ब्यूरो न्यूज डेस्क/अमर उजाला, लखनऊ
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प्रतीकात्मक तस्वीर
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जानलेवा फंगस कैंडिडा आरिस के संक्रमण की चपेट में आए दो मरीजों की जान बचाने में केजीएमयू के डॉक्टरों ने कामयाबी हासिल की है। इन मरीजों को मंगलवार को डिस्चार्ज कर दिया जाएगा। मरीजों की जान बचाने वाले डॉक्टरों की टीम ने पाया कि वक्त रहते जांच रिपोर्ट मिल जाए और उसके आधार पर एंटी फंगल दवाएं तय करके दी जाएं तो मरीज की जान बचाई जा सकती है।
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केस स्टडी : पिछले सप्ताह ट्रॉमा सेंटर में भर्ती मरीजों में हुई पुष्टि
पिछले सप्ताह ट्रॉमा सेंटर में भर्ती राजधानी निवासी दो मरीजों में कैंडिडा आरिस के संक्रमण की पुष्टि हुई। रिपोर्ट आते ही फौरन दोनों को मेडिसिन विभाग के आईसीयू यूनिट भेजा गया। यहां एसोसिएट प्रो. डी. हिमांशु ने सभी तरह की जांच के बाद दवाएं शुरू कीं।

सबसे बड़ी चुनौती थी फंगस का संक्रमण बढ़ने से रोकना

डॉ डी हिमांशु और डॉ प्रशांत गुप्ता - फोटो : अमर उजाला
सबसे बड़ी चुनौती थी फंगस का संक्रमण बढ़ने से रोकना
डॉ. डी. हिमांशु बताते हैं कि हमारे लिए सबसे बड़ी चुनौती फंगस की ग्रोथ रोकना था। इस तरह के केसेज में माइक्रोबायोलॉजी विभाग की टीम का अहम रोल होता है। यही हमने किया। यूरिन, ब्लड कल्चर की जांच रिपोर्ट आते ही हमने ये तय किया कि कौन सी एंटी फंगल और एंटी बैक्टीरियल दवाएं कारगर हो सकती हैं। हमने मरीजों की स्थिति के अनुसार डोज दिए।

टीम चपेट में न आए रखा खास खयाल
माइक्रोबायोलॉजी विभाग के डॉ. प्रशांत गुप्ता बताते हैं कि दूसरी बड़ी चुनौती थी लगातार निगरानी रखने वाली टीम को संक्रमण से बचाना। मरीजों को आइसोलेट करने के साथ ही उनके बेड, बिस्तर व अन्य चीजों की विशेष सफाई की जाती। जहां उन्हें रखा गया वहां की केमिकल से सफाई की जाती। मरीज से संपर्क में रहने वाले कर्मचारियों की प्रतिदिन स्क्रीनिंग की जाती। संक्रमण नियंत्रण के लिए सभी जरूरी चीजों का पालन किया गया जिससे संक्रमण नहीं फैला।
 
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दावा : दो और मरीजों की बचा चुके हैं जान

प्रतीकात्मक तस्वीर
कैंडिडा आरिस है क्या?
कैंडिडा आरिस एक खतरनाक फंगस है। यह गहन चिकित्सा कक्ष (आईसीयू) में भर्ती होने वाले बेहद कमजोर इम्यून सिस्टम वाले मरीजों को अपना शिकार बनाता है। डॉ. डी हिमांशु बताते हैं कि इसकी चपेट में आने वाले मरीजों में बार-बार बुखार आता है। त्वचा पर लाल चकत्ते, पेशाब नली में संक्रमण होता है।

.... इसलिए खास है डॉक्टरों की कामयाबी
इसकी चपेट में आने वाले ज्यादातर मरीजों की जान चली जाती है। खासतौर से उम्रदराज लोगों में बचने की गुंजाइश न के बराबर रहती है। मई में दिल्ली सहित अन्य बड़े शहरों में इसकी चपेट में आने वाले ज्यादातर मरीजों की 30 दिन के अंदर मृत्यु हो गई थी। इससे इसको लेकर दहशत फैल गई।

दो माह पहले भी ट्रॉमा के आईसीयू वार्ड में भर्ती तीन मरीजों में भी इसकी पुष्टि हुई थी। इनमें से एक मरीज की मौत हो गई थी, जबकि दो को बचा लिया गया था। हालांकि जिस मरीज की मौत हुई उसको लेकर डॉक्टरों का दावा है कि उसे निमोनिया सहित अन्य संक्रमण थे।
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