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मरने से पहले एक मरीज ने डॉक्टर को बताया अपना अनुभव, पढ़ें

Tue, 30 Aug 2016 11:33 AM IST
ब्यूरो/अमरउजाला, लखनऊ
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बातचीत - फोटो : demo pic
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डॉक्टरों द्वारा किए गए इलाज से ठीक हुए मरीजों की काफी चर्चाएं होती हैं, लेकिन इलाज के दौरान दम तोड़ चुके मरीज की कभी बात नहीं होती। 
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ट्रॉमा केसेस या अचानक सामने आई एडवांस स्टेज की बड़ी बीमारी में एक दिन से लेकर कुछ ही दिनों में होने वाली मौतों के मुकाबले हीमेटोलॉजिस्ट्स के पास मरीज एक  दिन में दम नहीं तोड़ते। 

मरने से पहले वे कई हफ्तों और महीनों तक डॉक्टरों से बार बार मिलते हैं, इस दौरान दोनों में एक जुड़ाव भी पैदा होता है। इसके बावजूद जब मरीज की मौत होती है तो उसे भी भुला दिया जाता है। 
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लेकिन इसके पीछे हर डॉक्टर की इसकी अपनी वजह हो सकती हैं। रविवार को लखनऊ के एसजीपीजीआई में खत्म हुई हीमेटोलॉजी पर दो दिवसीय सेमिनार में इस संवेदनशील मुद्दे पर चिकित्सकों ने अपने अनुभव साझा किए।

वेल्लोर के क्रिश्चियन मेडिकल कॉलेज में न्यूरो मस्क्युलर बीमारी की वजह से भोजन-पानी निगलने की क्षमता खो बैठा एक युवा मरीज भर्ती हुआ। वह निगलने की क्षमता वापस पा सके, इसके लिए एक सर्जरी की गई।

तभी उसकी हालत बिगड़ गई। उसे तुरंत वेंटीलेटर पर रखा गया। तीन महीने तक उसे वेंटीलेटर पर रखा गया। परिवार ने सभी संसाधन लगा दिए, लेकिन कोई परिणाम नहीं निकला। वे उसका और इलाज करवा पाने में असमर्थ थे।

मरीज वेंटीलेटर पर चेतन अवस्था में था। वह बोल नहीं पा रहा था, लेकिन लिखकर बात कम्युनिकेट कर रहा था। उसे बचाने के फिर से प्रयास किए गए, लेकिन असफल रहे। अंतत: वेंटीलेटर सपोर्ट हटाया गया।
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डॉक्टर रीना और डॉक्टर एना - फोटो : amar ujala
मनोचिकित्सक ने कुछ इस तरह संवाद किया। 
पहली विजिट पर मरीज ने लिखकर पूछा : तो आप चाहते हैं कि मैं मर जाऊं?
मनोचिकित्सक : हम नहीं चाहते कि आपकी मौत हो।
मरीज : आप मेरे लिया क्या कर सकते हैं?
मनोचिकित्सक और फिजिशियंस: मरीज को समझाया कि वेंटीलेटर सपोर्ट हटाना होगा। यह गैर कानूनी है, लेकिन हर अस्पताल में यही हर रोज हो रहा है। लोगों को वेंटीलेटरों पर जीवित रखने के संसाधन अभी किसी के पास नहीं हैं।

अगली विजिट में मरीज ने पूछा : अब आप किसलिए आए हैं?
अंतत: वेंटीलेटर सपोर्ट हटाया गया। मरीज को जानकारी देने के लिए मनोचिकित्सक, फिजिशियंस और सर्जनों ने बातचीत शुरू की। 
मनोचिकित्सक : मैं आपकी मदद के लिए आया हूं।
मरीज : मैं डरा हूं कि जब मैं मरूंगा, मुझे काफी दर्द से गुजरना होगा।
मनोचिकित्सक : मैं इस बात की तो गारंटी नहीं ले सकता कि मरते समय मुझे दर्द नहीं होगा, लेकिन इसकी गारंटी लेता हूं कि हम आपको दर्द सहते हुए मरने नहीं देंगे।

मरीज : मरने से पहले मैं परिवार से मिलना चाहूंगा। अगले हफ्ते उन्हें ले आएं।
मनोचिकित्सक : कुछ सदस्यों को लाया जा सकता है।
मरीज : मैं घर जा सकूंगा?
मनोचिकित्सक : पता नहीं।
मरीज : आपने मुझसे अब तक कुछ भी झूठ नहीं कहा है, अब भी कुछ मत छिपाइए।
मनोचिकित्सक : घर ले जाने के लिए रेलवे से अनुमति लेने के लिए 24 घंटे लगेंगे। 

मरीज : यानी मैं आज ही मरने जा रहा हूं?
मनोचिकित्सक : हां।
मरीज : मैं आपका आभार जताता हूं, लेकिन अब आप चले जाएं।
(मरीज के परिवार के सदस्य उससे मिलने आए। डॉक्टरों ने उसे अचेत करने के लिए दवाएं दीं और वेंटीलेटर्स हटा दिया। 

जीवन की आखिरी सांस की जंग लड़ रहे मरीज के साथ डील करते हुए डॉक्टर मरीज की चिंताएं सुनें। उसके लिए अपना जीवन खत्म होने के मायने क्या हैं? एक ओर जीवन खत्म हो रहा होता है तो दूसरी ओर डॉक्टरों को सबसे बेहतर ढंग से मरीज का साथ देना होता है। उसे दर्द को कम करने से लेकर उसकी चिंताओं को कम करने का प्रयास करना होता है। यह एक शोक है, जिसे डॉक्टर को मरीज के साथ मानना होता है। - डॉ. एना थरायन सीएमसी वेल्लोर

कई बार कुछ मामलों में निर्णय लेना मुश्किल होता है। एक परिवार का कमाऊ सदस्य मौत की ओर बढ़ रहा है, परिवार चाहता है कि वह कुछ समय और जी जाए ताकि बच्चों को बड़ा होकर सेटल कर सके। मरता हुआ शख्स भी एक ही सवाल पूछता है, ‘कितना समय और मेरे पास है?’ उसकी कुछ उम्र महंगे इलाज से बढ़ाई जा सकती है, लेकिन परिवार को अपना मकान बेचना होगा। घर बेचने के बाद भी अंतत: परिजन नहीं बचेगा, भविष्य का निर्णय परिवार को ही लेना होता है। लेकिन ऐसे मामलों में खुद डॉक्टरों को भी सबसे व्यवहारिक सुझाव परिवार और मरते हुए शख्स को देने होते हैं। यही पेलिएटिव केयर हीमेटोलॉजिस्ट्स के लिए एक बड़ी चुनौती है।- डॉ. रीना जॉर्ज सीएमसी वेल्लोर

 
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