उत्तर प्रदेश के दो बड़े शहरों में पुलिस आयुक्त प्रणाली इसी सप्ताह लागू हो सकती है। इसे लेकर गंभीरता से विचार किया जा रहा है। महकमे के अफसर इसे दबी जुबान में स्वीकार भी करने लगे हैं। हालांकि निर्णय शासन स्तर पर होना है और कैबिनेट में प्रस्ताव लाने के बाद ही। ऐसे में शासन के अफसरों ने इसकी गोपनीयता को बनाए रखा है।
सूत्रों का कहना है कि इस प्रणाली को लेकर शासन और पुलिस महकमे में अलग-अलग राय है। एक वर्ग इसे कामयाब बता रहा है, तो कुछ का कहना है कि यह प्रणाली जिस मकसद के साथ शुरू की गई थी, उसे पूरा करते हुए नहीं दिख रही है। माना जा रहा है कि इसी फैसले के चलते गाजियाबाद में पूर्ण कालिक एसएसपी की तैनाती रुकी हुई है। वहां पवन कुमार के एसएसपी के पद से निलंबित होने के बाद पहले आईजी, फिर डीआईजी और बाद में एसएसपी रैंक के अफसर को कार्यवाहक एसएसपी बनाकर भेजा गया है। जबकि इसी अवधि में निलंबित हुए दो जिलाधिकारियों सोनभद्र व औरया में तैनाती उसी दिन चंद घंटों में ही कर दी गई थी।
गौतमबुद्घनगर में एसएसपी के निलंबन के बाद लागू हुई थी यह प्रणाली
गौतमबुद्घनगर में 9 जनवरी, 2020 को तत्कालीन एसएसपी वैभव कृष्ण को निलंबित कर दिया गया था और इसके चार दिन बाद वहां यह प्रणाली लागू करने की घोषणा हुई थी। 2020 में लखनऊ और गौतमबुद्घनगर में आयुक्त प्रणाली लागू की गई और 2021 में कानपुर नगर और वाराणसी में इसका विस्तार किया गया। माना जा रहा है कि गाजियाबाद और मेरठ या गाजियाबाद और प्रयागराज में इस व्यवस्था को जल्द लागू किया जा सकता है।
गाजियाबाद में क्यों जरूरी
राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) के प्रमुख शहरों में केवल गाजियाबाद ही ऐसा शहर बचा है जहां पुलिस आयुक्त प्रणाली नहीं है। गाजियाबाद में अपराध का रेट भी प्रदेश के अन्य जिलों की तुलना में काफी अधिक है। गाजियाबाद की अधिकतर आबादी शहरी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी इस बात पर जोर देते रहे हैं कि बड़ी आबादी वाले शहर में पुलिस आयुक्त प्रणाली लागू की जाए।