लखनऊ। किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय (केजीएमयू) के ट्रॉमा सेंटर में अब पीले के बजाय गुलाबी रंग के परचे बनेंगे। इसका मकसद दोनों परचों के बीच अंतर करना है। ऐसा देखा गया है कि कई विभाग ओपीडी वाले मरीजों को भी ट्रॉमा सेंटर में भर्ती कर लेते हैं। इससे गंभीर मरीजों को इलाज नहीं मिल पाता। नई व्यवस्था के बाद इस पर रोक लगेगी।
केजीएमयू के ट्रॉमा सेंटर में 491 बेड हैं। यहां प्रदेश भर से सड़क दुर्घटना और इमरजेंसी के अन्य गंभीर मरीजों को भर्ती किया जाता है। मरीजों को कैजुएल्टी में प्राथमिक इलाज देकर संबंधित विभाग के वार्ड में शिफ्ट किया जाता है। विभागों पर मरीजों का दबाव कम रहे, इसलिए कई वार्ड में मरीजों को ओपीडी के माध्यम से भर्ती कर लिया जाता है। ऐसा होने पर ट्रॉमा के वार्ड में बेड भर जाते हैं और गंभीर मरीज भर्ती नहीं हो पाते। इसे देखते हुए केजीएमयू प्रशासन ने ट्रॉमा और ओपीडी के परचों के रंग अलग करने का फैसला लिया है। ऐसा होने पर ओपीडी वाले मरीज दूर से पहचान में आ जाएंगे। इससे गंभीर मरीजों को भर्ती करने के लिए बेड उपलब्ध रहेंगे।
24 घंटे के भीतर शिफ्ट नहीं हो रहे मरीज
ट्रॉमा सेंटर की कैजुएल्टी से मरीजों को 24 घंटे के भीतर शिफ्ट किया जाना चाहिए। इसके पीछे पहली वजह आने वाले मरीजों को प्राथमिक उपचार के लिए बेड खाली करना और दूसरी मरीज को विशिष्ट उपचार उपलब्ध कराना है। कैजुएल्टी में सिर्फ इमरजेंसी के विशेषज्ञ होते हैं, जबकि अन्य विधाओं के विशेषज्ञ इमरजेंसी के बजाय संबंधित विभाग में बैठते हैं। इसके बावजूद वार्ड के बेड खाली न होने से मरीज और घायलों को कई दिनों तक कैजुएल्टी में रखना पड़ता है। नई व्यवस्था के बाद इस पर रोक लगेगी।
Iकेजीएमयू की मुख्य ओपीडी और ट्रॉमा सेंटर के परचों के रंग अब अलग होगा। ट्रॉमा सेंटर में अब परचों का रंग गुलाबी होगा। इससे दोनों मरीजों के बीच अंतर हो सकेगा। इस व्यवस्था से ट्रॉमा सेंटर के बेड जरूरतमंद मरीजों के लिए उपलब्ध हो सकेंगे।I
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- प्रो. प्रेमराज सिंह, सीएमएस, केजीएमयू ट्रॉमा सेंटरI