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स्कूल-कॉलेज नहीं चाहते कि उनके यहां आएं ट्रांसजेंडर

Thu, 24 Sep 2015 11:19 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, लखनऊ
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सुप्रीम कोर्ट ने ट्रांसजेंडर्स के हक को मान्यता देते हुए उन्हें मुख्यधारा में शामिल करने के आदेश दिए। उन्हें ‘थर्ड जेंडर’ मानते हुए इसका विकल्प तक स्कूल, कॉलेज में प्रवेश से लेकर अलग-अलग क्षेत्रों में नौकरी और पहचान पत्र बनाने के आदेश हैं।
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इसके बाद भी लखनऊ के स्कूल, कालेजों ने ट्रांसजेंडर्स की एक संस्था को अपने परिसर में ही कार्यशाला करने से मना कर दिया।

सरकारी मदद से ट्रांसजेंडर्स के हित के लिए काम कर रही पहचान संस्था के एक पदाधिकारी दीपक कुलश्रेष्ठ ने बताया कि करीब 15 स्कूल, कॉलेज में हम गए।

हमारा उद्देश्य युवाओं को ट्रांसजेंडर्स की समस्याओं और उनके हक के बारे में बात करना था। हम चाहते थे कि युवा इस समुदाय के लोगों के बारे में जानें। उनके मन में मौजूद गलत तथ्यों को निकालकर ट्रांसजेंडर्स को अपनाने के लिए तैयार किया जाए।
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स्कूलों से मिले ऐसे-ऐसे जवाब

चौंकाने वाला तथ्य यह था कि सभी प्रिंसिपल या प्रबंधकों ने ऐसी कार्यशाला के लिए अपना परिसर ही देने से मना कर दिया। उनका कहना था कि इससे बच्चों पर बुरा असर पड़ने की आशंका है। वह खुद डर में थे कि इस कार्यशाला को पता नहीं बच्चे और उनके परिजन किस तरह लेंगे।

मना करने वालों में सरकारी और निजी दोनों ही तरह के संस्थान शामिल हैं। स्‍कूल-कॉलेजों में जगह नहीं मिली तो चारबाग के एक होटल में यह कार्यक्रम करना पड़ा। यहां गिनती के ही युवा अलग-अलग संस्थानों से पहुंचे।

जब युवाओं से पूछा गया कि क्या वह अपने घरों में ट्रांसजेंडर्स का घरेलू काम करने देंगे? इनका जवाब भी ना में आया। युवाओं को डर था कि ऐसा करने से उनके यहां झगड़े बढ़ जाएंगे।

मौजूद विशेषज्ञों ने इन युवाओं के पूर्वाग्रह को दूर करने के लिए जानकारी भी दी जिससे वह ट्रांसजेंडर्स को भी अपना दोस्त और सहकर्मी के रूप में अपना सकें।
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