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Lucknow News: शहर की स्मृतियों में आज भी बसे हैं केपी सक्सेना के व्यंग्य

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केपी सक्सेना के साथ सूर्यकुमार पांडेय। फाइल फोटो
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लखनऊ। देश के प्रमुख व्यंग्यकारों में शामिल पद्मश्री केपी सक्सेना अपने शानदार व्यंग्याें की वजह से आज भी शहर की स्मृतियों में जीवित हैं। अपने पात्र मिर्जा के जरिये सामाजिक कुरीतियों पर व्यंग्य को घर-घर पहुंचाने वाले केपी सक्सेना की सोमवार को जयंती है। उनका जन्म 13 अप्रैल 1934 में हुआ था। उर्दू में उपन्यास लिखने वाले केपी सक्सेना ने अपने गुरु अमृतलाल नागर की सलाह पर व्यंग्य लिखना शुरू किया और फिर उनका यह सफर फिल्म लेखन तक पहुंचा। उन्होंने लगान, जोधा अकबर, स्वदेश और हलचल जैसी फिल्मों के संवाद भी लिखे।
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केपी सक्सेना ने समाचारपत्रों के लिए 17 हजार से ज्यादा कॉलम लिखे। वह जितना अधिक अपने व्यंग्य स्तंभ लेखन के लिए जाने जाते थे, उतना ही कवि सम्मेलन में गद्य व्यंग्य पाठ के लिए पहचाने जाते थे। लखनऊ के मशहूर व्यंग्यकार सूर्यकुमार पांडेय बताते हैं कि मंचों पर तो उनके साथ एक लंबा समय गुजरा ही, उनसे मेरे पारिवारिक संबंध भी प्रगाढ़ थे। वह सिलसिला आज भी बरकरार है। केपी सक्सेना ने लगभग 50 पुस्तकें लिखी थीं, जिनमें वनस्पति शास्त्र पर लिखी गई किताबें भी शामिल हैं।
उन्होंने आकाशवाणी के लिए 147 नाटक लिखे जो एक राष्ट्रीय कीर्तिमान है। इसके अतिरिक्त उन्होंने दूरदर्शन के लिए भी 50 नाटक लिखे हैं। उनके लिखे दूरदर्शन के धारावाहिकों में ‘बीबी नातियों वाली’ समेत अन्य टीवी शो भी खूब लोकप्रिय हुए। ‘गज फुट इंच’ और ‘बाप रे बाप’ उनके चर्चित नाटक हैं जिनका आज भी मंचन होता है। सूर्यकुमार बताते हैं कि केपी की लेखन शैली विशिष्ट थी। अमृतलाल नागर के बाद उन्होंने खत्म होती लखनवी जबान को बचाए रखा। उन्हें भारत सरकार ने पद्मश्री से नवाजा था। 2012 में उप्र हिंदी संस्थान ने उन्हें हिंदी गौरव सम्मान दिया था। 31 अक्तूबर, 2013 को लंबी बीमारी के बाद उनका निधन हो गया था।
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