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मंडी परिषद के उपनिदेशक समेत तीन निलंबित, बिना काम कराए ठेकेदार को किया था 8 करोड़ का भुगतान

Mon, 18 Nov 2019 04:29 PM IST
ishwar ashish न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
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प्रतीकात्मक तस्वीर
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मंडी परिषद में बिना काम कराए ठेकेदार को आठ करोड़ रुपये का अग्रिम भुगतान करने पर उप निदेशक समेत तीन अभियंताओं को निलंबित कर दिया गया है। ठेकेदार समेत सभी दोषी अधिकारियों केे खिलाफ चित्रकूट के कर्वी थाने में मुकदमा भी दर्ज कराया गया है। अनुबंध रद्द करने के साथ ही फर्म पर 4.85 करोड़ रुपये का जुर्माना भी लगाया गया है। चित्रकूट के कर्वी में विशिष्ट मंडी स्थल की अधूरी निर्माण परियोजना के मामले में यह कार्रवाई हुई है।

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परियोजना की जांच में पता चला कि संबंधित ठेकेदार को बिना काम कराए ही 8 करोड़ रुपये का अग्रिम भुगतान कर दिया गया। इससे ठेकेदार ने समय से काम पूरा करने में रुचि नहीं ली। अग्रिम भुगतान की जानकारी उच्चाधिकारियों को भी नहीं दी गई थी। इतना ही नहीं काम पूरा होने की झूठी रिपोर्ट भी मंडी मुख्यालय भेज दी गई।

अमर उजाला ने इस मामले को 15 अक्तूबर के अंक में प्रमुखता से उठाया था। जांच में मामला सही पाए जाने पर अवैध रूप से पेमेंट के दोषी तत्कालीन उप निदेशक (निर्माण) एमएम कांत, तत्कालीन सहायक अभियंता अनिल त्रिपाठी और अवर अभियंता रामेंद्र सिंह को सस्पेंड कर दिया गया है। वर्तमान में एमएम कांत मेरठ में, अनिल त्रिपाठी कानपुर और रामेंद्र सिंह झांसी में तैनात हैं।

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झूठी रिपोर्ट भेजने के आरोप में रिपोर्ट दर्ज

इन तीनों के साथ ही ठेकेदार के खिलाफ भी कर्वी थाने में गबन और झूठी रिपोर्ट भेजने के आरोप में रिपोर्ट दर्ज कराई गई है। वसूली की कार्रवाई प्रारंभ न करने पर तत्कालीन उप निदेशक, निर्माण सुरेश चंद्र व अशोक कुमार के खिलाफ विभागीय कार्रवाई के आदेश दिए गए हैं। मंडी परिषद के अधिकारियों के खिलाफ एक साथ एफआईआर और निलंबन की कार्रवाई पहली बार की गई है। परिषद के अध्यक्ष मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ हैं। इस मामले में उनके कड़े रुख से खलबली मची है।

सपा शासन में हुआ था निर्माण का फैसला
सपा शासन में कर्वी (चित्रकूट) में विशिष्ट मंडी स्थल बनाने का फैसला हुआ था। इस परियोजना की कुल लागत 57.89 करोड़ रुपये मंजूर थी। एस्टीमेट में दुकानों, नीलामी चबूतरों, गोदाम, कैंटीन, जलाशय, कृषक विश्राम गृह और आंतरिक मार्ग का निर्माण शामिल था। परियोजना को मई 2015 तक पूरा करना था, लेकिन वर्ष 2017 में भी काम पूरा नहीं हो सका। यह काम गाजियाबाद की फर्म मेसर्स ग्लेयर इन्फ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड करा रही थी।
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