लखनऊ। लविवि के दर्शनशास्त्र विभाग के स्नातक छात्र अभिन्न श्याम तिवारी के तीन पेपर अंतरराष्ट्रीय जर्नल में प्रकाशित हुए हैं। एक छात्र के तौर पर ऐसा कर अभिन्न ने इतिहास रचा है क्योंकि विश्वविद्यालय के वरिष्ठ शिक्षकों तक को अंतरराष्ट्रीय जर्नल में पेपर प्रकाशित करने में मशक्कत करनी पड़ती है। अभिन्न का उद्देश्य आम लोगों तक उन चीजों को पहुंचाना है, जिसे हम अक्सर भूल जाते हैं।
लखनऊ विश्वविद्यालय से इसी सत्र में बीए कर जेएनयू में पीजी में दाखिला लेने वाले अभिन्न ने बताया कि शुरुआत से ही मेरे घर में धर्म, दर्शन आदि पर चर्चा होती रही और मैं इस पर लिखने के लिए प्रेरित होता रहा। लखनऊ विवि में फिलॉसफी, इंग्लिश व पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन से पढ़ाई शुरू की। यहां शिक्षक स्व. प्रो. केसी पांडेय ने और प्रो. राकेश चंद्रा ने पब्लिकेशन के लिए प्रेरित किया। कोविड के दौरान समय मिला और मैं पढ़ाई के साथ इस कार्य में भी जुट गया। मैंने पहला पेपर सुसाइड पर लिखा। जो इंटरनेशनल जर्नल ऑफ ह्यूमेटीस कोलकाता में प्रकाशित हुआ। दूसरा पेपर ‘एप्सील्यूट एंड आईडेंटिटी स्टेटसमेंट’ फिलॉसफिकल पेपर्स में प्रकाशित हुआ। इसमें मैंने भगवान के होने और न होने को लेकर चर्चा की है। इसके लिए मैंने अद्वैत वेदांत, फ्रेगा, शंकराचार्य व राधाकृष्णन को पढ़ा भी। तीसरा पेपर ‘रामराज्य ए डिफरेंस फ्रॉम टोटली टेरिनजम्म’ लखनऊ विवि में हुई इंटरनेशनल कांफ्रेंस के पब्लिकेशन में प्रकाशित हुआ।
घर में शुरू से मिला पढ़ाई का माहौल
अभिन्न के अनुसार, पिता आनंद शंकर तिवारी बिजनेसमैन हैं, उन्होंने भी इंग्लिश लिटरेचर से पढ़ाई की है और मां अरुणा तिवारी ने लॉ किया है। इसलिए घर में लिखने-पढ़ने का माहौल शुरुआत से ही रहा। जेएनयू से पीजी करके मैं दर्शनशास्त्र में ही शिक्षक बनना चाहता हूं। अभी भी लोगों में धर्म और दर्शन को लेकर काफी भ्रांतियां हैं, जिसे दूर करने की जरूरत है। कई बार हम इन चीजों को लेकर बहुत कुछ बोल जाते हैं, लेकिन इसका हमारे पास कोई प्रमाण नहीं होता है। हमें इसका कारण पता होना चाहिए क्योंकि हमारे देश में धर्म एक बहुत बड़ा मुद्दा है।
शिक्षकों को विवि को देनी पड़ी थी राहत
लविवि में यूजीसी के नए नियमों के अनुसार प्रोफेसर, असिस्टेंट व एसोसिएट को पीएचडी कराने के लिए यूजीसी रेफरीड जर्नल में निर्धारित पेपर प्रकाशित होने की अर्हता निर्धारित की गई थी। किंतु विवि के कई शिक्षक इस नियम को पूरा नहीं करते थे जिसकी वजह से विवि प्रशासन ने उनको पीएचडी कराने के लिए राहत दी है। तय किया गया कि पहले से पीएचडी कराने वाले शिक्षक शोध गाइड बन सकेंगे जबकि नए शिक्षकों के लिए यह नियम प्रभावी होगा।