प्रदेश के सरकारी और सहायता प्राप्त इंजीनियरिंग व प्रबंधन कॉलेजों में पढ़ने वाले छात्रों के लिए यह राहत भरी खबर है कि इस सत्र में फीस बढ़ाने का इरादा टाल दिया गया है।
प्राविधिक शिक्षा विभाग ने इस पर विभागीय मंत्री यानी मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से सहमति मांगी है। विभाग ने तर्क दिया है कि सत्र शुरू हुए छह माह बीत गए हैं। एक सेमेस्टर की परीक्षा भी हो चुकी है।
ऐसी स्थिति में फीस यदि बढ़ाई भी जाए तो अगले सत्र से ली जाए। इस पर अंतिम निर्णय मुख्यमंत्री को करना है।
प्रदेश के सरकारी, सहायता प्राप्त और निजी इंजीनियरिंग व प्रबंधन कॉलेज उत्तर प्रदेश प्राविधिक विश्वविद्यालय से संचालित होते हैं।
प्रदेश में सात सरकारी, सात सहायता प्राप्त और 712 निजी इंजीनियरिंग व प्रबंधन कॉलेज हैं। निजी कॉलेजों में फीस तय करने के लिए नियामक आयोग का गठन किया गया है।
सरकारी व सहायता प्राप्त कॉलेजों के लिए प्रमुख सचिव प्राविधिक शिक्षा की अध्यक्षता में कमेटी गठित की गई है। इन कॉलेजों में प्रत्येक तीन साल में फीस तय करने की व्यवस्था है।
फीस नियामक आयोग ने निजी कॉलेजों में अगस्त 2013 में ही फीस तय कर दिया था। सरकारी व सहायता प्राप्त कॉलेजों में फीस दिसंबर तक जब तय नहीं की जा सकी।
तो विभागीय स्तर पर यह सहमति बनी की इस सत्र से फीस न बढ़ाकर अगले सत्र से बढ़ाई जाए, भले ही फीस इसी सत्र में तय कर दी जाए। इसके आधार पर ही विभागीय मंत्री को प्रस्ताव भेजा गया है।
कैसे तय होती है फीस
निजी कॉलेजों में खर्च के आधार पर फीस तय की जाती है। उदाहरण के लिए शिक्षक, स्टाफ व कॉलेज संचालन के कुल खर्च को जोड़ा जाता है। इस खर्च को प्रति छात्र के हिसाब से बांटते हुए फीस तय की जाती है।
इसमें छात्रावास और मेस खर्च को शामिल नहीं किया जाता है। सरकारी व सहायता प्राप्त कॉलेजों में बढ़ती महंगाई के हिसाब से 10 से 20 फीसदी तक बढ़ोतरी की जाती है।