शहर में विभिन्न इलाकों में बसी अवैध झोपड़पट्टी।
- फोटो : संवाद
लखनऊ। शहरी इलाकों स्थित बहुत से खेतों में अनाज के बजाय झुग्गी-झोपड़ियों की फसल लहलहा रही है। महीनों की मेहनत के बाद बीघे भर खेत में मुश्किल से पांच हजार रुपये का अनाज पैदा होता है। वहीं झुग्गी-झोपड़ियों के लिए खेत किराये पर देने के एवज में हर महीने 20 से 25 हजार रुपये की कमाई हो जाती है।
विकास नगर इलाके में जहां आग की चपेट में आकर 1200 झुग्गियां जलकर राख हुई हैं, वहां पांच किलोमीटर की दायरे में ही इस तरह दर्जनों छोटी-बड़ी झुग्गी बस्तियां हैं। इन्हें बसाने में क्षेत्रीय नेताओं का भी नाम आता है। बगैर बुनियादी सुविधाओं के बेहद गंदगी में यहां रहने वाले परिवारों पर संक्रामक रोगों का साया बना रहता है।
लाक्षागृह से कम नहीं हैं ये बस्तियां
यहां रहने वाले ज्यादातर लोग कूड़ा और कबाड़ का काम करते हैं। अपने आसपास कूड़ा-कबाड़ का ढेर लगाए रहते हैं। ऐसे में ये झुग्गी बस्तियां किसी लाक्षागृह से कम नहीं होतीं। एक चिंगारी से विकास नगर जैसी आग की बड़ी घटना हो जाती है। इसके बावजूद जिम्मेदारों ने इस पर पूरी तरह से आंखें मूंद रखी हैं। इनकी सुरक्षा की बात आने पर जिम्मेदार एक-दूसरे के पाले में गेंद डालने लगते हैं।
आखिर कौन है इनका जिम्मेदार...
बेतरतीब ढंग से बसाई गईं ये झुग्गी-झोपड़ियां किसकी जिम्मेदारी है, इसका स्पष्ट जवाब किसी के पास नहीं है। नगर निगम सिर्फ सड़क के आसपास बसी झुग्गी-झोपड़ियों को अतिक्रमण मानकर हटाने की बात कहता है। विकास प्राधिकरण अपनी जमीन पर बसी झुग्गियों की जिम्मेदारी भी नहीं लेता है। ऐसे में हर वर्ष आग की घटनाएं होती रहती हैं।
शहर में विभिन्न इलाकों में बसी अवैध झोपड़पट्टी। - फोटो : संवाद
शहर में विभिन्न इलाकों में बसी अवैध झोपड़पट्टी। - फोटो : संवाद
शहर में विभिन्न इलाकों में बसी अवैध झोपड़पट्टी। - फोटो : संवाद