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Lucknow News: नाटक से बुजुर्गों के एकाकीपन के दर्द की खोलीं परतें

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लखनऊ। अस्पताल में इलाज कराने पहुंची बुजुर्ग महिला से जब एडमिशन फॉर्म भरते समय वयोवृद्ध डॉक्टर ने पूछा कि आपकी उम्र क्या है तो वे कहती हैं कि स्त्रियों से उनकी उम्र पूछना बेहूदा सवाल है। जवाब में डॉक्टर कहते हैं कि एक स्त्री का सबसे बड़ा दुर्गुण उसका सनकीपन होता है। यह वार्तालाप नाटक विभास का एक दृश्य था, जिसका मंचन मंगलवार को संगीत नाटक अकादमी की वाल्मीकि रंगशाला में किया गया। नाटक के जरिये एकाकीपन से परेशान बुजुर्गों की परेशानी बयां की गई।
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थिएटर आर्ट्स वर्कशॉप (टॉ) अपनी 59वीं वर्षगांठ मना रहा है, जिसकी स्थापना रंगमंच की दुनिया के मजबूत स्तंभ रहे पद्मश्री राज बिसारिया ने की थी। उन्हीं की याद में उनके आखिरी नाटक विभास को टॉ पुनर्जीवित कर रहा है। इसे राकेश वेदा ने रूपांतरित किया है। नाटक में बुढ़ापे का भावनात्मक संघर्ष और अकेलापन दिखाया गया है। डॉक्टर की भूमिका बॉलीवुड अभिनेता व वरिष्ठ रंगकर्मी डॉ. अनिल रस्तोगी ने निभाई, जबकि पूर्व थियेटर आर्टिस्ट बुजुर्ग महिला गीता चौधरी का किरदार निभाया वेदा राकेश ने।
हल्के-फुल्के हास्य संवादों से शुरू होकर यह नाटक जैसे-जैसे आगे बढ़ता है, समाज में बुजुर्गों के एकाकीपन के दर्द की परतें खुलती जाती हैं। इसके जरिये मानवीय रिश्तों का संवेदनशील चित्रण किया गया। इस दौरान वरिष्ठ रंगकर्मी सूर्यमोहन कुलश्रेष्ठ व लेखक दयानंद पांडेय भी थे।
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आठवां सर्ग में मंच पर उतरा कालिदास का रचनात्मक संघर्ष

वाल्मीकि रंगशाला में टॉ की ओर से ही शाम को एक अन्य नाटक आठवां सर्ग का भी मंचन किया गया। यह नाटक महाकवि कालिदास के रचनात्मक संघर्ष और कुमार संभव को अधूरा छोड़ने के उनके निर्णय को सामने लाता है। इसे सुरेंद्र वर्मा ने लिखा है और प्रफुल्ल त्रिपाठी समेत सौम्या चावला और विकास सिंह ने इसमें अहम भूमिका निभाई। इस नाटक में कुछ नए और प्रतिभाशाली अभिनेताओं को भी शामिल किया गया। इस अवसर पर अन्वेषा मिश्रा और आद्या घोषाल द्वारा लिखित पुस्तक प्रिपरेशन फॉर प्रिपरेशन (तैयारी के लिए तैयारी : सही मानसिकता का निर्माण) का विमोचन भी किया गया। पुस्तक की परिकल्पना प्रफुल्ल त्रिपाठी की है।
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