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कोमा में गए बुजुर्ग, 37 दिन वेंटिलेटर पर रहे, 13 डॉक्टरों की टीम ने बचाई जान

Mon, 11 Mar 2019 01:36 AM IST
सौरभ दिक्षित न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
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बुजुर्ग मरीज - फोटो : अमर उजाला
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केजीएमयू के पल्मोनरी एंड क्रिटिकल केयर मेडिसिन विभाग की टीम ने सीपीआर और ब्रोंकोस्कोपी की मदद से कोमा में गए मरीज की जान बचाने में कामयाबी हासिल की है। आजमगढ़ के कोलघाट निवासी अधिवक्ता बलिहारी यादव (71) 23 जनवरी को चक्कर आने के बाद गिर पड़े थे।
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परिवारीजन उन्हें निजी अस्पताल ले गए, लेकिन सुधार नहीं हुआ। वह कोमा में चले गए। परिवारीजन 29 जनवरी को रात नौ बजे उन्हें लेकर ट्रॉमा पहुंचे। यहां उन्हें पल्मोनरी एंड क्रिटिकल केयर मेडिसिन विभाग के चिकित्सक डॉ. वेद प्रकाश ने देखा। हालत गंभीर होने पर रेस्पिरेटरी इंटेंसिव केयर यूनिट में रखा गया।

यूनिट प्रभारी एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. वेद प्रकाश की टीम ने तत्काल एक्स-रे, सीएसएफ और सीटी स्कैन सहित सभी जांचें कराईं तो दिमागी बुखार और दिमागी टीबी की पुष्टि हुई। इस दौरान उल्टी होने से फेफड़ा पूरी तरह से चोक हो गया था।
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इंफेक्शन से आंतरिक हिस्से में रक्तस्राव भी हो गया, जिसकी वजह से आहार और सांस नली पूरी तरह से बंद हो गई। फेफड़ों ने भी काम करना बंद कर दिया था। पहले लगा निमोनिया है, लेकिन जांच में पता चला कि खून के थक्के जमने से बांया फेफड़ा प्रभावित हुआ है। इस पर तत्काल एंटीबायोटिक्स के साथ एंटीफंगल, एंटीट्यूबरकुलर थेरेपी व अन्य जीवन रक्षक दवाएं दी ग

छोटे-छोटे टुकड़ों में निकाले खून के थक्के
भर्ती होते ही रात करीब दो बजे डॉ. वेद प्रकाश व उनकी टीम ने आठ बार ब्रोंकोस्कोपी की। इस दौरान एक बार में करीब 12 सेंटीमीटर और दूसरी बार में करीब 10 सेंटीमीटर और फिर छोटे-छोटे टुकड़े में खून के थक्के बाहर निकाले। उन्हें वेंटिलेटर पर रखा गया।

दो बार सीपीआर देकर लौटाई सांसें
डॉ. वेद ने बताया कि इलाज के दौरान पहली बार सात फरवरी की रात मरीज के हार्ट ने जवाब दे दिया। सांसें टूटने लगीं। वह आनन-फानन आरआईसीयू पहुंचे। पूरी टीम के साथ सीपीआर देना शुरू किया। करीब 12 मिनट के प्रयास के बाद रिकवरी हो गई। दोबारा 18 फरवरी को फिर मरीज की कोशिकाएं जवाब दे गईं। इस बार करीब 15 से 18 मिनट सीपीआर देना पड़ा। दरअसल, सीपीआर मरीज की जान बचाने में प्राथमिक चिकित्सा पद्धति है। ऑक्सीजन न मिलने पर शरीर की कोशिकाएं खत्म होने लगती हैं तो सीपीआर के तहत मरीज के सीने को हाथ से दबाकर पंपिंग की जाती है। कई बार मरीज के मुंह में फूंक कर ऑक्सीजन दिया जाता है। इससे सांसें चलने लगती हैं।

दिमाग की झिल्ली में सूजन से बढ़ी मुसीबत
मरीज के सीटी स्कैन कराने पर पता चला कि दिमागी बुखार की वजह से दिमाग की झिल्ली में सूजन हो गई थी। इसमें दिमाग का पानी अधिक दबाव की वजह से प्रभावित हो गया था। आमतौर पर इसमें शेंटिंग करना पड़ता है, लेकिन दवाओं के जरिये ठीक किया गया।

डॉक्टर व स्टाफ की इस टीम ने बचाई जान
इस मरीज की जान बचाने में डॉ. वेद प्रकाश के साथ डॉ. लक्ष्मी, डॉ. अंकित, डॉ. सुलक्षणा, डॉ. अभिषेक, डॉ. अहवाब, डॉ. कैफी, डॉ. अल्पिका, डॉ. विकास, डॉ. शैैलेंद्र, डॉ. आकाश, डॉ. प्रियंका, डॉ. संतोष, डॉ. ऐना के, सिस्टर इंचार्ज सुशीला, मेराज, रतिका, संदीप, शामिनी, नेहा, सिमरन, शिवानी, अनीश, आदर्श, केके शुक्ला, हिना, आलिया, एसपी मौर्या, नवनीत शामिल थे।

ये थीं जटिलताएं
दिमागी बुखार और दिमागी टीबी की वजह से इंफेक्शन बढ़ गया था। मरीज कोमा में था। बार-बार उल्टी होने से बिना पचा भोजन आहार नाल व फेफड़े में पहुंच गया था। आंतरिक हिस्से में रक्तस्राव से फेफड़ा में खून के थक्के जम गए थे। अन्य आंतरिक हिस्सों ने काम करना बंद कर दिया था। उम्र अधिक थी। सांसें बार-बार टूट रही थीं।

मृत्युदर में आई गिरावट
डॉ. वेद के मुताबिक आरआईसीयू में आने वाले मरीजों की मृत्युदर शुरुआती दौर में करीब 60 फीसदी थी। पिछले दो साल में इसमें लगातार गिरावट आई है। अब स्थिति यह है कि केजीएमयू के आरआईसीयू में आने वाले मरीजों की मृत्युदर घटकर 36 फीसदी पर आ गया है। यह देश के अन्य चिकित्सा संस्थानों की तुलना में सर्वाधिक है। अन्य संस्थानों में आरआईसीयू की मृत्युदर औसतन 40 फीसदी है।
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