रामपुर के जुठिया निवासी फूल अहमद को गन्ना काटकर गेहूं की बुवाई करनी थी। मिलें न चलने पर वह अपना गन्ना चारे के रूप में बेच रहा था।
बृहस्पतिवार को कुट्टी मशीन पर गन्ना लेने से इन्कार करने पर उसने भाकियू नेताओं को बुलाकर चार बीघा गन्ने के खेत में आग लगा दी।
प्रदेश की अर्थव्यवस्था में 25 से 30 हजार करोड़ का योगदान करने वाले गन्ना उत्पादक किसानों की बदहाली बयां करने के लिए ये उदाहरण काफी हैं।
दरअसल हर गन्ना किसान इसी पीड़ा से गुजर रहा है। पेराई सत्र में एक माह की देरी से किसानों पर चौतरफा मार पड़ी है। खेत में खड़ा गन्ना उनकी धड़कनें बढ़ा रहा है।
पिछले सत्र का 2320 करोड़ रुपया न मिलने से पुराना कर्ज नहीं चुकाया जा सका। गन्ना काटकर गेहूं की बुवाई करने वाले किसान चिंतित हैं कि उन्हें खुद भी गेहूं दूसरों से खरीदना पड़ेगा। पशुओं के सामने चारे का संकट भी परेशानी का बड़ा सबब बना हुआ है।
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प्रदेश के किसान चीनी मिलों को करीब साढ़े 22 हजार करोड़ का गन्ना आपूर्ति करते हैं। पांच से सात हजार करोड़ रुपये का गन्ना कोल्हू, खांडसारी इकाइयों, जूस व बीज आदि में जाता है।
दो दर्जन जिलों में गन्ने को किसानों की लाइफलाइन कहा जाता है। पश्चिमी यूपी में तो सियासत के रंग को बनाने बिगाड़ने में गन्ना अहम भूमिका निभाती है।
इस बार सियासी कोल्हू में किसानों की ही पेराई हो रही है। आजादी के बाद यह पहला सीजन है जब मुख्यमंत्री के आदेशों को चीनी उद्योग ने हवा में उड़ा दिया।
पहले नवंबर के पहले सप्ताह में चीनी मिल शुरू करने का अल्टीमेटम दिया गया, फिर कार्तिक पूर्णिमा के बाद।
मुख्यमंत्री ने कहा था कि 25 नवंबर तक वेस्ट यूपी और 29 नवंबर तक अन्य क्षेत्रों में गन्ना पेराई न करने पर मिलों पर सख्त कार्रर्वाई होगी।
प्रमुख सचिव चीनी उद्योग एवं गन्ना विकास ने इस डेडलाइन को क्रमश: चार दिसंबर और सात दिसंबर तक बढ़ा दी।
सरकार के किसान हितैषी होने के दावों व विपक्षी दलों की तीखी आलोचनाओं के बीच चीनी मिलों का पेराई सत्र लगातार पिछड़ता जा रहा है।
राष्ट्रीय किसान मजदूर संगठन के अध्यक्ष वीएम सिंह कहते हैं कि सरकार ने दो दिन पहले जो रवैया अख्तियार करने का दावा किया है, वह एक महीने पहले किया जाता तो किसान मरने से बच जाते। सरकारी की शह पर ही चीनी मिलों का रुख किसान विरोधी रहा।
भाकियू नेता नरेंद्र राणा कहते हैं कि अपनी पूंजी को चंद सालों में कई गुना बढ़ा चुके चीनी मिलों के घाटे की प्रदेश से लेकर केंद्र सरकार तक को चिंता है।
उन किसानों की चिंता कौन करेगा, जो चीनी मिल न चलने से बर्बाद हो गए हैं। क्या सरकारी चिंता कॉर्पोरेट दुनिया तक ही सीमित रह गई है। चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत कहते थे- ‘तंग आए सो जंग आए’। हालात ऐसी ही बनते जा रहे हैं।
राजनीति खूब पर गंभीर नहीं सियासी दल
गन्ना किसानों की बदहाली पर सियासी रोटियां खूब सेकी जा रही हैं। कई दलों में एक उनके पक्ष में बयानबाजी की होड़ लगी है, लेकिन उनकी समस्या के हल के लिए गंभीरता नहीं दिख रही।
चूंकि साल चुनावी है, इसलिए इसकी आड़ में सत्ता पक्ष पर हमले का अवसर ढूंढा जा रहा है। गन्ना विभाग मुख्यमंत्री के पास है।
किसी विपक्षी दल ने जरूरी नहीं समझा कि ब्यूरोक्रेसी की नजरों से स्थितियों के आकलन के दौर में उनका डेलीगेशन मुख्यमंत्री से मिलकर उन्हें जमीनी हकीकत बताता।
इतने बड़े संकट के समय भी कोई बड़ा नेता किसानों के बीच नहीं पहुंच रहा। कांग्रेस को तो लगता है कि गन्ना किसानों की ज्यादा चिंता है ही नहीं।
भाजपा नेता बयानों में सबसे आगे हैं। पश्चिमी यूपी में गन्ना किसानों की अगुवाई का दावा करने वाले रालोद के आयोजन भी प्रतीकात्मक और राजनीतिक ज्यादा नजर आ रहे हैं।
कुछ जिलों में भाकियू कार्यकर्ता डेरा डाले हुए हैं तो कानूनी लड़ाई राष्ट्रीय किसान मजदूर संगठन के संयोजक वीएम सिंह लड़ रहे हैं।
‘चीनी बिक्री को नियंत्रण में ले केंद्र’
किसान जागृति मंच के संयोजक डॉ. सुधीर पंवार ने केंद्र सरकार चीनी बिक्री के रिलीज मकेनिज्म को खत्म करने के फैसले पर पुनर्विचार का आग्रह किया है।
उन्होंने कहा कि चीनी की रिलीज पर नियंत्रण खत्म होने के बाद से ही रेट गिरे हैं। केंद्र सरकार सुनिश्चित करे कि किस माह चीनी का कितना कोटा रिलीज होगा।
40 जिलों में कल चक्का जाम करेगा रालोद
रालोद के प्रदेश अध्यक्ष मुन्ना सिंह चौहान ने दावा किया है कि गन्ना उत्पादक 40 जिलों में किसान एक दिसंबर को चक्का जाम करेंगे।
अन्य जिलों में किसान उनके समर्थन में सांकेतिक धरना प्रदर्शन करेंगे। उन्होंने प्रदेश सरकार व चीनी मिलों पर साठगांठ का आरोप लगाया।
चौहान ने कहा कि प्रदेश की सबसे बड़ी कैश क्रॉप की बदहाली पर कभी चिंतन नहीं किया गया। ट्रिपल बी (बजाज, बलरामपुर और बिड़ला) ग्रुप को सरकार का संरक्षण है।
वे ही चीनी मिलें नहीं चलने दे रहे हैं। सरकार की नीयत का पता इससे चलता है कि रालोद से समझौता वार्ता के बाद फैजाबाद की मसौधा मिल 22 नवंबर से पेराई शुरू करना चाहती थी।
बड़े ग्रुप इसके खिलाफ थे। उन्होंने अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर इस मिल के तौल केंद्र नहीं लगने दिए।
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