पूर्व केंद्रीय मंत्री और हाल में भाजपा में शामिल हुए सुब्रह्मण्यम स्वामी की शुक्रवार को लखनऊ की यात्रा ने राजनीतिक गलियारों में हलचल मचा दी है।
लखनऊ से उनके चुनाव लड़ने की चर्चा शुरू हो गई है। हालांकि स्वामी का कहना है कि उनके चुनाव लड़ने व कहां से लड़ेंगे।
इसका फैसला पार्टी का संसदीय बोर्ड और प्रमुख नेता करेंगे, लेकिन लखनऊ से उनके जुड़ाव को देखते हुए नई पारी की शुरुआत लखनऊ से शुरू करने की संभावनाओं से इन्कार नहीं किया जा सकता। उनके राजनीतिक जीवन की शुरुआत लखनऊ से ही हुई थी।
लखनऊ से ही हैं वोटर लखनऊ से उनके लगाव को सिर्फ इसी से समझा जा सकता है कि वे आज भी लखनऊ से ही वोटर हैं। लखनऊ न सिर्फ उनके राजनीतिक जीवन की प्राथमिक पाठशाला बल्कि तमिल व अंग्रेजी भाषी स्वामी को हिंदी सिखाने वाला शिक्षक भी रहा है।
उन्होंने इसी धरती पर चुनाव प्रबंधन और मीडिया से रिश्तों का ककहरा भी सीखा। लखनऊ में तमाम लोगों से उनके निजी रिश्ते आज भी हैं।
नानाजी देशमुख लेकर आए लखनऊ
जानकारी के मुताबिक, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ प्रचारक नानाजी देशमुख हार्वर्ड यूनिवर्सिटी से सुब्रह्मण्यम स्वामी को लखनऊ लेकर आए थे तब जनसंघ का काममाज सौंपा। यह 1970 की बात है।
यूपी ने ही बनाया संसद
आपातकाल से पहले राज्यसभा चुनाव का मौका आया तो जनसंघ ने उन्हें उम्मीदवार बना दिया। पुराने लोग बताते हैं कि मतदान के दिन खूब संघर्ष हुआ। विधानभवन के बाहर लाठीचार्ज भी हुआ, पर स्वामी जीत गए।