चंद्रभानु गुप्त और संपूर्णानंद के बीच रिश्ते काफी मधुर थे। पर, सियासत में कब किससे किसकी ठन जाए कहना मुश्किल है। ऐसा ही कुछ चंद्रभानु गुप्त और संपूर्णानंद के बीच हुआ। हुआ यह कि चंद्रभानु गुप्त जब मुख्यमंत्री बनाए गए तो वह किसी सदन के सदस्य नहीं थे।
नियमानुसार वह छह महीने बिना किसी सदन का सदस्य रहते हुए भी मुख्यमंत्री रह सकते थे, लेकिन गुप्ता जी के विरोधी गुट ने इस प्रश्न को नैतिकता का प्रश्न बना दिया। अप्रिय विवाद को शांत करने के लिए कांग्रेस नेतृत्व ने उन्हें विधान परिषद सदस्य मनोनीत होने का सुझाव दिया।
पहले तो गुप्त ने इनकार किया लेकिन नेतृत्व के बार-बार कहने और इस समय किसी विधायक का त्यागपत्र न कराने की बात कहकर उन्हें इसी रास्ते पर काम करने को कहा। गुप्त ने अपने संस्मरण में लिखा है, मैं विधान परिषद सदस्य मनोनीत हो गया। मेरे किसी सदन का सदस्य न होने पर सवाल उठाने वाले फिलहाल शांत हो गए ।