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नखलऊवा पंचः चंद्रभानु गुप्त और संपूर्णानंद के बीच क्यों हुए मतभेद, पढें पूरा मामला

Tue, 29 Oct 2019 04:19 PM IST
Amulya Rastogi न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
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चंद्रभानु गुप्त और संपूर्णानंद - फोटो : amar ujala
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चंद्रभानु गुप्त और संपूर्णानंद के बीच रिश्ते काफी मधुर थे। पर, सियासत में कब किससे किसकी ठन जाए कहना मुश्किल है। ऐसा ही कुछ चंद्रभानु गुप्त और संपूर्णानंद के बीच हुआ। हुआ यह कि चंद्रभानु गुप्त जब मुख्यमंत्री बनाए गए तो वह किसी सदन के सदस्य नहीं थे।

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नियमानुसार वह छह महीने बिना किसी सदन का सदस्य रहते हुए भी मुख्यमंत्री रह सकते थे, लेकिन गुप्ता जी के विरोधी गुट ने इस प्रश्न को नैतिकता का प्रश्न बना दिया। अप्रिय विवाद को शांत करने के लिए कांग्रेस नेतृत्व ने उन्हें विधान परिषद सदस्य मनोनीत होने का सुझाव दिया।

पहले तो गुप्त ने इनकार किया लेकिन नेतृत्व के बार-बार कहने और इस समय किसी विधायक का त्यागपत्र न कराने की बात कहकर उन्हें इसी रास्ते पर काम करने को कहा। गुप्त ने अपने संस्मरण में लिखा है, मैं विधान परिषद सदस्य मनोनीत हो गया। मेरे किसी सदन का सदस्य न होने पर सवाल उठाने वाले फिलहाल शांत हो गए ।

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सीएम बनने के बाद एमएलसी बनने पर उठाई आपत्ति

चंद्रभानु गुप्त
पर, उनकी ईर्ष्या और बढ़ गई। उन्होंने मेरे और डॉ. संपूर्णानंद के बीच साजिशन भ्रम फैलाया। संपूर्णानंद ने पत्र लिखकर मुख्यमंत्री बनने के बाद एमएलसी बनने पर आपत्ति उठाई। मैंने उन्हें उदाहरण दिया कि चक्रवर्ती राजगोपालाचारी भारत के गर्वनर जनरल पद से हटने के बाद जब मद्रास के मुख्यमंत्री बने तो उन्हें एमएलसी मनोनीत किया गया।

मुख्यमंत्री रहते एमएलसी बनने में कोई संवैधानिक बाधा नहीं थी लेकिन फिर भी मेरा मन कचोटता था। मैने गोविंद वल्लभ पंत और कांग्रेस नेतृत्व के सुझाव पर मैंने विधान परिषद सदस्य बनने का फैसला किया। मुझे लगता है कि मेरे विरोधी लोगों ने आपके मन में गलतफहमी भरी है। डॉ. संपूर्णानंद को शायद मेरा जवाब ठीक नहीं लगा और वह नाराज हो गए।
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