राजधानी लखनऊ में बीरबल साहनी पुराविज्ञान संस्थान (बीएसआईपी) में रॉक मैग्नेटिज्म इन अर्थ साइंसेज विषय पर सोमवार को तीन दिवसीय क्षमता निर्माण कार्यशाला की शुरुआत हुई। मुख्य अतिथि पंजाब विवि के एमेरिटस प्रो. अशोक सहनी ने बताया कि 1980 के दशक से पूर्व दक्कन इंटरट्रैपियन शैलक्रमों को इओसीन काल का माना जाता था। लेकिन, 1980 के बाद इन निक्षेपों से डायनासोर की अस्थियां, अंडों के खोल और दांत मिलने के बाद इन्हें क्रेटेशस काल का माना गया। कहा कि पर्यावरणीय चुंबकत्व का उपयोग मिट्टी बनने की प्रक्रिया, धूल के स्रोतों की पहचान और प्रदूषण की निगरानी में किया जाता है।
बीएसआईपी के निदेशक प्रो. एम. जी. ठक्कर ने कहा कि चुंबकीय मापों से मानसून की तीव्रता, अपरदन और पर्यावरणीय परिस्थितियों का अनुमान लगाया जा सकता है। पक्षी बिना दिशा के उड़ान नहीं भरते, बल्कि पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र का उपयोग दिशा-निर्धारण और मार्गदर्शन के लिए करते हैं, जिसे ‘मैग्नेटोरिसेप्शन’ कहा जाता है, जहां चुंबकीय संकेतों के आधार पर स्थानिक स्मृति कार्य करती है।
चट्टान चुंबकत्व (रॉक मैग्नेटिज्म) चट्टानों और मिट्टी में मौजूद चुंबकीय गुणों के अध्ययन से संबंधित है, जिससे पृथ्वी के पुराने चुंबकीय क्षेत्र, जलवायु परिवर्तन, भूगर्भीय प्रक्रियाओं और पर्यावरणीय बदलावों को समझने में मदद मिलती है।