बाम्बे टाकीज की नौकरी छोड़ने के बाद भगवती बाबू ने मुंबई के सेठ राधाकृष्ण खेतान और कानपुर के रामरतन गुप्त के छोटे भाई रामगोपाल गुप्त के आर्थिक सहयोग से अपने पत्र 'विचार' का प्रकाशन फिर शुरू किया था। पहले ही अंक ने धूम मचा दी।
वरिष्ठ पत्रकार ज्ञानचंद जैन के एक संस्मरण से पता चलता है, पत्र की प्रसिद्धि देख रामगोपाल गुप्त ने भगवती बाबू से कहा, 'दो एक दिन में मैं आपको 50 हजार रुपये की चेक दे दूंगा। प्रेस जरा बड़ा लगाइए।' भगवती बाबू यह सुनकर बड़े प्रसन्न हुए, पर नियति को कुछ और ही मंजूर था। घर लौटे तो एक तार उनका इंतजार कर रहा था। तार फिरोज गांधी का था।
लिखा था, ' लखनऊ में 'नवजीवन' का प्रधान संपादक का दायित्व स्वीकार करने की स्वीकृति दें और दिल्ली में रफी किदवई से मिलने का कष्ट करें? भगवती बाबू के सामने एक तरफ मुंबई में प्रेस लगाकर मालिक बन पैर जमाने का सुंदर प्रस्ताव और दूसरी तरफ लखनऊ जाने का। पर भगवती बाबू ने तुरंत नवजीवन का प्रधान संपादक बनने की स्वीकृति दे दी।