आखिर ऐसी कौन सी मजबूरी है जो ‘सरकार’ खां साहब के इतने नाजो-नखरे बर्दाश्त कर रही है?
यह सवाल अब समाजवादी पार्टी के लोग भी उठाने लगे हैं। चाहे कैबिनेट की बैठकों में शामिल होने का मसला हो या सरकारी कार्यक्रमों में शिरकत करने का या फिर किसी मुद्दे पर राय रखने का। खां साहब अपने हिसाब से चलते हैं।
हद तो तब हो गई जब विभागीय एजेंडे के बावजूद खां साहब कैबिनेट की बैठक में नहीं पहुंचे। बाद में सफाई दी कि दूसरी बैठकें थी इसलिए कैबिनेट में नहीं गए। यानी कैबिनेट से ज्यादा अहमियत वह अपनी बैठकों को दे रहे हैं।
उनकी यह फितरत अब ‘सरकार’ को भी नागवार गुजर रही है। खां साहब की गैरमौजूदगी में सरकारी योजनाओं में अल्पसंख्यकों का कोटा तय करने संबंधी फैसला करके ‘सरकार’ ने उन्हें यह संदेश तो दे ही दिया कि कोई गलतफहमी न पालें।
‘सरकार’ का रुख देख खां साहब के विरोधी मुस्लिम नेता भी सक्रिय हो गए हैं। अंबेडकरनगर वाले ‘चचा’ को सरकार ने पहले से ही आगे कर रखा है। अब दूसरे मुस्लिम नेता भी खां साहब की जड़ खोदने में जुट गए हैं।
कहा तो यहां तक जा रहा है कि जिस तरह का माहौल बन रहा है उसमें वह दिन दूर नहीं जब खां साहब पूरी तरह अलग-थलग दिखाई देंगे क्योंकि ‘सरकार’ अब उन्हें ज्यादा भाव देने के मूड में नहीं है।
‘नेताजी’ की वजह से उनकी पूछ हो रही थी लेकिन जब खां साहब नेताजी की भी नीयत पर सवाल उठाने लगेंगे तो कौन करेगा बर्दाश्त।