नवाब साहब के जलवे से कौन नहीं वाकिफ है। पार्टी हो या फिर विभाग उनके नाजो-नखरे उठाते-उठाते हर कोई थका जा रहा है।
यही कारण है कि विभाग में इक्का-दुक्का लोगों को छोड़ दें तो हर कोई बचके निकल लेना चाहता है।
केंद्रीय प्रतिनियुक्ति से लौटे एक अधिकारी को उनके विभाग का मुखिया बना दिया गया। वह बेचारे सीधे-साधे। ऊपर के आदेश को सिर माथे लगाते हुए कुर्सी संभाल ली।
मन लगाकर काम भी करना शुरू कर दिया। सोचा दिल्ली वाले तजुर्बे का फायदा विभाग को देंगे।
प्लानिंग शुरू कर दी। एक से एक उम्दा प्लानिंग। पर यह अधिक दिनों तक नहीं चला।
वजह बताने की जरूरत नहीं। सब जानते हैं कि विभाग के लिए बस वही काफी हैं। मुखिया होने या न होने का कोई मतलब नहीं।