नौकरशाही में एक लेडी सेक्रेटरी और उनके एक बैचमेट में शह-मात का खेल चल रहा है।
दरअसल बड़े-बड़े प्रिंसिपल सेक्रेटरी तक मैडम की नजरे इनायत होने की बाट जोहते रहते हैं। मगर वे हैं कि मैडम का ट्रेनिंग के टाइम वाला आधा नाम ही पुकारते हैं, वह भी सरेआम उनके दफ्तर में पहुंचकर। मैडम को उम्मीद थी कि उनका रुतबा बढ़ेगा तो साथी की स्टाइल में बदलाव भी आ जाएगा।
ज्यादा न सही बिना काम वाली जगह से बेहतर पोस्टिंग के लिए ही नमस्ते करता नजर आएगा। मगर हुआ उल्टा। अव्वल तो वह दफ्तर की ओर आता नहीं है और यदि आता है तो बिल्कुल हमजोली जैसी बातें ही करता रहता है।
मैडम असहज महसूस करने के बावजूद कुछ नहीं कह पा रही हैं और वह अपना रवैया बदलने को तैयार नहीं है। आखिरकार मैडम ने फोनकर समझा ही दिया कि यार, कम से कम दफ्तर में तो अपनी दोस्त की इमेज का ख्याल रखा।
बाकी बातें तो हम सब करते ही रहेंगे। लगे हाथ उन्होंने बैचमेट को बेहतर पोस्टिंग का चारा भी डाला लेकिन बैचमेट ने प्रस्ताव ठुकरा दिया।