एनजीटी के निर्देश के बाद प्रदेश के 12 जिलों में पटाखों पर लगे प्रतिबंध के बाद पटाखा व्यापारियों को भारी चपत लगी है। तीन महीने पहले से दीपावली की तैयारी करने वाले व्यापारियों को भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है। थोक में पटाखे का कारोबार करने वाले व्यापारियों को समझ में नहीं आ रहा है कि आखिर दीपावली पर बिक्री के लिए मंगाए गए पटाखों क्या किया जाए? सरकार कह रही है कि व्यापारी उन जिलों में पटाखे ले जाकर बेचें जहां पाबंदी नहीं है। लेकिन उक्त जिलों में भी पहले से कारोबारी पटाखा मंगवा चुके हैं। अब प्रतिबंधित जिलों के पटाखा व्यापारी अपना माल औने-पौने दाम पर बेचने को मजबूर हैं। रोक वाले जिलों में पटाखों का स्टॉक शासन-प्रशासन के लिए बड़ी चुनौती बन गया है क्योंकि इसे लंबे समय तक सुरक्षित रखने के कोई पुख्ता इंतजाम नहीं हैं।
एनजीटी की रोक के बाद शासन और प्रशासन के सामने सबसे बड़ी चुनौती तीन महीने पहले से आ चुके पटाखों के स्टॉक को खपाने की है। व्यापारियों का भी करोड़ों रुपये फंस गया है। पुलिस अफसरों का कहना है कि एनजीटी और राज्य सरकार की गाइडलाइन का पालन कड़ाई से कराया जाएगा। प्रतिबंध वाले जिलों के व्यापारियों को अपना माल उन जिलों में खपाने की सलाह दी गई है जहां पाबंदी नहीं है। व्यापारियों का कहना है कि ऐसा करने में उन्हें कोई फायदा नहीं है। क्योंकि उन जिलों के लिए भी स्थानीय व्यापारियों ने पहले से पटाखों का भंडारण कर रखा है। जो पटाखे लखनऊ में बिक्री के लिए आए हैं वे आसपास के जिलों जैसे बाराबंकी, रायबरेली, उन्नाव, सीतापुर, हरदोई में औने-पौने दाम पर ही बिक सकेंगे।
राजधानी के बाहर बने हैं पटाखों के लिए 38 गोदाम
लखनऊ में पटाखों का थोक में काम करने वाले 46 व्यापारी हैं। इनके कुल 38 गोदाम पटाखों को स्टोर करने के लिए हैं। यह सभी गोदाम काकोरी में हैं। वहीं पुलिस ने थोक कारोबार करने के लिए 35 लाइसेंस इस वर्ष जारी किए थे, जिसे स्थगित कर दिया गया है। इसके अलावा 120 आवेदन और किए गए थे, जिस पर अभी निर्णय नहीं किया गया था। लाइसेंसधारी को गोदाम के बारे में पहले से बताना होता है। ऐसे में पुलिस अफसरों का कहना है कि शहर के अंदर पटाखों का कोई कारोबार नहीं होता। पटाखों की बिक्री भी पिछले चार साल से राजधानी के बाहर काकोरी के अमेठी सलेमपुर गांव में स्थाई दुकानों पर हो रही है।