फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

Valentine stories: पहली नजर ने ऐसा जादू कर दिया...

Sun, 14 Feb 2016 04:07 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, लखनऊ
विज्ञापन
विज्ञापन
सच है कि जोड़ियां आसमान से बनकर आती हैं। पर उसे निभाने के लिए रिश्तों की बुनियाद विश्वास और ईमानदारी की नींव पर रखनी पड़ती है। संबंधों को बनाए रखने के लिए किसी को कम तो किसी को बहुत संघर्ष करना पड़ता है।
विज्ञापन


इस वैलेंटाइन डे पर कुछ बात करें उनकी जिन्होंने अपने प्यार को पाने के लिए तो संघर्ष किया ही, पर रिश्तों की डोर को मजबूती से बांधे रखने के लिए भी कम तपस्या नहीं की। कितनी ही मुश्किलें आईं, लेकिन उनके विश्वास और प्यार में कोई कमी नहीं आई।

पहला गिफ्ट दिलाने ले गए बनारस
पहली बार 1963 में जब नरेश चंद्रा और डॉ. पुष्पलता की मुलाकात हुई तो दोनों ने सोचा भी नहीं था कि वह एक दिन जीवनसाथी बन जाएंगे। दौर भी ऐसा कि लव मैरिज वो भी इंटरकास्ट, सोचना ही बहुत हिम्मत का काम हुआ करता था।
विज्ञापन

प्यार के आगे पिता ने भर दी हामी...

नरेश चंद्रा बताते हैं कि कानपुर में दोस्त के घर पुष्पलता से मुलाकात हुई थी। पढ़ाई पूरी कर राजनीति में कदम रखा था, जबकि पुष्पलता केजीएमयू में मेडिकल की छात्रा थीं। वहां से जो बातचीत शुरू हुई वह लखनऊ आने के बाद भी जारी रही।

नरेश चंद्रा कहते हैं कि केजीएमयू के विजय लक्ष्मी गर्ल्स हॉस्टल एक ही फोन था, और बात करने के लिए घंटों इंतजार करना पड़ता था। कब प्यार हो गया, पता ही नहीं चला। पुष्पलता को पहला गिफ्ट देना था। किसी को बताया नहीं और उन्हें लेकर चले गए बनारसी साड़ियां दिलाने। उस पल को याद कर पुष्पलता आज भी घबरा उठती हैं।

कहती हैं कि उस वक्त किसी के साथ कहीं चले जाना, बहुत हिम्मत का काम था। शुरू में पिताजी ने बहुत विरोध किया, लेकिन हमारे प्यार के आगे उन्होंने विवाह के लिए हामी भर दी और 1967 में हम दोनों विवाह बंधन में बंधे। नरेश चंद्रा (पूर्व मंत्री), डॉ. पुष्पलता चंद्रा (पूर्व सीएमएस) (फोटो- इमरान)

एक-दूसरे की सादगी ने ले लिया दिल

डॉ. जगदीश गांधी कहते हैं कि उन दिनों जब भी मंदिर जाता तो यही प्रार्थना करता था कि उनकी कभी शादी न हो। यह सोच दिल में घर कर चुकी थी कि घर की माली हालत इतनी खराब कि पता नहीं पत्नी को दो वक्त की रोटी भी मिल पाएगी या नहीं।

अचानक एक सत्संग में भारती को देखा तो लगा कि इतनी सादगी जिस लड़की में है, उससे अच्छा जीवन साथी कोई नहीं हो सकता। बस तुरंत ही भारती के पिता को अगले दिन घर पर चाय के लिए बुला लिया। उनके पिता समझ भी न सके कि ये हो क्या रहा है।

भारती के पिता आए तो बिना किसी लागलपेट के कहा कि अपनी बेटी की शादी हमसे करवा दीजिए। यह सुनकर वह अवाक रह गए।

बोले, दिमाग खराब है क्या...

बोले, दिमाग खराब है क्या। खैर, किसी तरह से वह राजी हुए। घर में इतना पैसा भी नहीं था कि शादी कर सकें। उधार लेकर सिर्फ दो रुपये में शादी हो गई।

डॉ. भारती कहती हैं कि उन्हें डॉ. जगदीश की ईमानदारी भा गई। लोग प्रेमिका को उपहार में कार्ड या फूल देते हैं, लेकिन डॉ. जगदीश ने गीता प्रवचन, स्त्री शक्ति की किताबें दीं।

डॉ. भारती कहती हैं कि जिस तरह से जगदीश ने कहा कि मुझसे शादी के बाद शायद सड़क पर भी सोना पड़ जाए उनकी सादगी और ईमानदारी भा गई और शादी के हां कर दी।  डॉ. जगदीश गांधी व डॉ. भारती गांधी (संस्थापक सीएमएस) (फोटो- अ‌मित)

15 दिनों में बदल गई लाइफ

लखनऊ में इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टड अकाउंटेंट्स ऑफ इंडिया में जनरल मैनेजमेंट कम्यूनिकेशन स्किल्स ट्रेनिंग प्रोग्राम चल रहा था, जब पहली बार सपन और आकांक्षा की मुलाकात हुई। वैसे तो आकांक्षा दिल्ली में पढ़ती थीं लेकिन इस ट्रेनिंग के लिए उनको लखनऊ ही मिला।

दोनों 15 दिन तक रोज ही मिलते रहे और साथ में डांस व सिंगिंग सहित विभिन्न इवेंट्स में हिस्सा लिया। इसके बाद आकांक्षा वापस दिल्ली चली गईं। दोनों को अलग होने के बाद एक दूसरे की कमी अखरने लगी। दोनों फोन पर बात तो करते लेकिन धीरे-धीरे लगा कि वह एक-दूसरे के लिए ही बने हैं।

...पर प्यार जीत गया और घरवाले मान गए

सपन को लखनऊ में जॉब मिल रही थी, लेकिन वह आकांक्षा से मिलने की वजह से दिल्ली जाकर जॉब करने लगे। इसके बाद दोनों की मुलाकतें बढ़ने लगीं। उन दिनों आकांक्षा सीए प्रैक्टिस के साथ ही पीसीएस की तैयारी भी कर रही थीं।

आखिरकार दोनों ने एक दूसरे से प्यार का इजहार भी कर लिया। इंटरकास्ट होने की वजह से घर वालों को समझाना आसान नहीं था। पर प्यार जीत गया और घरवाले मान गए।

आकांक्षा को आज भी वह दिन याद है जब पीसीएस का इंटरव्यू देने जाना था और 14 फरवरी के दिन ही सपन ने उनको खादी की एक साड़ी दी। आकांक्षा ने बताया कि सपन सेटल हो चुके था। घरवाले शादी का दबाव बना रहे थे, लेकिन उन्होंने साथ नहीं छोड़ा। सपन वर्मा (सीए) और आकांक्षा गुप्ता (पीसीएस) (फोटो- मनीष)

दोस्ती होने में दो साल लग गए

दोनों की पहली मुलाकात 1992 में जेएनयू में हुई, जब वह एमए कर रहे थे।  दोस्ती होने में ही दो साल बीत गए। 1994 में पीजी के एग्जाम के दौरान दोनों की दोस्ती हुई। इसके बाद वहीं से एमफिल की पढ़ाई करने लगे। साथ में समय बिताते हुए पता ही नहीं चला कि कब एक दूसरे के इतना करीब आ गए।

डॉ. मालविका ने बताया कि उनको डॉ. हरिओम इसलिए पसंद थे, क्योंकि वह हर क्षेत्र में टॉपर थे। बात चाहे पढ़ाई की हो या लुक्स की। उनका सिंगर होना भी बहुत मायने रखता था।

दोनों ने बिना फॉर्मल प्रपोजल के ही मन में ठान लिया कि एक दूसरे के साथ ही जीवन बिताना है। फिर सोचा कि जब तक कॅरिअर सेट न हो जाए घर पर बात नहीं करेंगे। इसी बीच डॉ. हरिओम का पीसीएस और फिर आईएएस में चयन हो गया, तब जाकर दोनों ने अपने घर में बात की।

गिफ्ट में दिया मीरा के भजनों का कैसेट

डॉ. हरिओम यूपी के रहने वाले और डॉ. मालविका दिल्ली की। पैरेंट्स ने कहा कि क्या वह यूपी में एडजस्ट नहीं कर पाएंगी, डॉ. मालविका भी पूरी तरह से मन बना चुकी थीं। आखिरकार घर वालों को मानना ही पड़ा और 17 फरवरी 1998 को दोनों की शादी हो गई।

डॉ. मालविका ने बताया कि उनको पहले उपहार के रूप में डॉ. हरिओम ने मीरा के भजनों का एक कैसेट दिया जो आज भी संभालकर रखा है।

उनकी यह सादगी भी बहुत पसंद आई कि एक लड़का रोमांटिक गीतों की जगह भजनों का कैसेट दे रहा है। वहीं डॉ. मालविका ने पहला उपहार एक कोटेशन वाला फ्रेम दिया। डॉ. हरिओम कहते हैं मालविका दिल्ली में रहते हुए भी वह बहुत साधारण थीं। डॉ. हरिओम (आईएएस) और डॉ. मालविका (फोटो- मनीष)
विज्ञापन

वैलेंटाइन डे पर होता है डबल सेलिब्रेशन

डॉ. पवित्र रस्तोगी और राखी रस्तोगी के लिए तो हर वैलेंटाइन डे डबल सेलिब्रेशन का दिन होता है। पहला वैलेंटाइन डे और दूसरा उनकी शादी की सालगिरह। डॉ. पवित्र को आज भी वह दिन नहीं भूलता जब 18 फरवरी, 1999 को वह इंदिरानगर में अपने कजिन के घर गए हुए थे। वहीं राखी से मुलाकात हुई।

डॉ. पवित्र उन दिनों केजीएमयू में इंटर्नशिप कर रहे थे, राखी शाहजहांपुर से बीएससी कर रही थीं। कजिन के घर रात करीब तीन बजे तक अंताक्षरी चली। उसी दिन वह ताल फिल्म देखकर गए थे, राखी को देखते ही लगा कि ऐश्वर्या राय सामने खड़ी है। अगले दिन राखी वापस शाहजहांपुर चली गई। उससे पहले अपना फोन नंबर डॉ. पवित्र को दे दिया।

डॉ. पवित्र को अब भी याद है, जब वह एसपी हॉस्टल के पास अब्बास भाई की कैंटीन पर लगे पीसीओ से राखी को फोन करते थे। पहली बार जब कॉल किया तो राखी की मां ने उठाया और पवित्र ने घबराकर काट दिया। दोनों ने ही अपने पैरेंट्स को मनाकर इस लव मैरिज को अरेंज मैरिज में बदला। 14 फरवरी 2000 में वह विवाह बंधन में बंधे। डॉ. पवित्र रस्तोगी (डेंटिस्ट, केजीएमयू) और राखी रस्तोगी (टीचर)
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें