पैदावार में देखे गए ये बदलाव
- पारंपरिक रासायनिक खाद (नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटैशियम) की जरूरत 50 फीसदी घट गई।
- फसलों का उत्पादन औसत से 25 फीसदी तक बढ़ गया।
- पोषक तत्व बढ़ जाने से फसलों में रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ गई।
- जहरीले कीटनाशकों की जरूरत भी काफी कम हो गई।
- माइक्रोब्स (सूक्ष्म जीव) से भरपूर इस खास जैव उर्वरक की मदद से फसलें क्लाइमेट चेंज, अधिक ताप, सूखा व बारिश के दुष्प्रभावों से निपटने में भी ज्यादा सक्षम साबित हुई।
- यह उर्वरक बंजर हो रहे खेतों में भी जान डाल देता है। इसके व्यावसायिक उत्पादन के लिए हैदराबाद की एक कंपनी से हाल ही में एमओयू किया गया है।
चुनौतीपूर्ण रही अच्छी नस्ल के बैक्टीरिया की छंटनी
डॉ. पीएस चौहान बताते हैं कि ये सूक्ष्मजीव इतने बारीक होते हैं कि सुई की नोक पर करोड़ों की संख्या में आ जाते हैं। एजोटोबैक्टर, राइजोबियम, एजोस्पिरिलम, पोटैशियम मोबिलाइजिंग बैक्टीरिया और फॉस्फेट घुलनशील बैक्टीरिया, इन पांचों अलग प्रकार के सुयोग्य, सक्षम और अच्छी नस्ल (स्ट्रेन) के बैक्टीरिया को चिह्नित करना और उन्हें लैब में तैयार कराना काफी मुश्किल भरा काम रहा।
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भारत विविधतापूर्ण जलवायु वाला देश है। हर तरह के पर्यावरण में ये जीव जीवित रह सकें, इसके लिए ऐसे बैक्टीरिया ही चिह्नित किए गए, जो 30 से 40 डिग्री सेल्सियस तापमान और पीएच 5 से 9 के बीच वाले एल्कलाइन या एसिडिक मिट्टी में भी आसानी से पल-बढ़ सकें।
यह जैव उर्वरक एक अहम शोध साबित होने वाला है
एनबीआरआई के निदेशक डॉ. अजीत कुमार शासनी ने बताया कि उड़ीसा और मेघालय में भी इस जैव उर्वरक के शानदार परिणाम मिले हैं। फसलों की गुणवत्ता व किसानों की आय बढ़ाने के साथ ही टिकाऊ खेती और पर्यावरण संतुलन की दिशा में एनबीआरआई का यह जैव उर्वरक एक अहम शोध साबित होने वाला है।