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UP: बंजर भूमि में भी पौधों को अमृत देगा गुड बैक्टीरिया वाला खास उर्वरक, नौ लाख एकड़ खेती में किया गया प्रयोग

Tue, 27 May 2025 01:19 PM IST
भूपेन्द्र सिंह विनीत चतुर्वेदी, अमर उजाला, लखनऊ

सार

गुड बैक्टीरिया वाला खास उर्वरक अब बंजर भूमि में भी पौधों को अमृत देगा। यूपी में नौ लाख एकड़ खेती में इसका प्रयोग करके देखा गया है। इसके उपयोग से उपज में 25% की वृद्धि मिली है। रासायनिक खाद, एनपीके और जहरीले कीटनाशकों की जरूरत आधी रह जाती है।  
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बंजर भूमि (सांकेतिक) - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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इंसानों में पाए जाने वाले गुड बैक्टीरिया के बारे में तो आपने सुना होगा। ऐसे ही पौधों व फसलों की अच्छी सेहत के लिए भी कई गुड बैक्टीरिया होते हैं। राष्ट्रीय वनस्पति अनुसंधान संस्थान (एनबीआरआई) के वैज्ञानिक ने 11 वर्ष के शोध के बाद फसलों के लिए संजीवनी माने जाने वाले पांच विभिन्न बैक्टीरिया (सूक्ष्म जीवाणु) को चिह्नित करके उनसे खास तरह का जैव उर्वरक बनाया है। उत्तर प्रदेश में नौ लाख एकड़ खेतों में इसका प्रयोग किया गया। परिणाम चौकाने वाले रहे। 

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एनबीआरआई के माइक्रोबियल टेक्नोलॉजी विभाग के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. पीएस चौहान की ओर से ईजाद किए गए गुड बैक्टीरिया वाले इस खास जैव उर्वरक को पर्यावरण संतुलन और टिकाऊ खेती में नई उम्मीद के तौर पर देखा जा रहा है। राज्य कृषि विभाग ने अपनी दस जैव उर्वरक निर्माण इकाइयों में इस खास उर्वरक का व्यावसायिक उत्पादन शुरू किया है। 200 ग्राम के 22.72 लाख पैकेट किसानों को वितरित किए गए हैं। इससे हजारों किसान लाभान्वित हुए हैं। 

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पैदावार में देखे गए ये बदलाव 

  • पारंपरिक रासायनिक खाद (नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटैशियम) की जरूरत 50 फीसदी घट गई। 
  • फसलों का उत्पादन औसत से 25 फीसदी तक बढ़ गया। 
  • पोषक तत्व बढ़ जाने से फसलों में रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ गई। 
  • जहरीले कीटनाशकों की जरूरत भी काफी कम हो गई। 
  • माइक्रोब्स (सूक्ष्म जीव) से भरपूर इस खास जैव उर्वरक की मदद से फसलें क्लाइमेट चेंज, अधिक ताप, सूखा व बारिश के दुष्प्रभावों से निपटने में भी ज्यादा सक्षम साबित हुई। 
  • यह उर्वरक बंजर हो रहे खेतों में भी जान डाल देता है। इसके व्यावसायिक उत्पादन के लिए हैदराबाद की एक कंपनी से हाल ही में एमओयू किया गया है। 

चुनौतीपूर्ण रही अच्छी नस्ल के बैक्टीरिया की छंटनी 

डॉ. पीएस चौहान बताते हैं कि ये सूक्ष्मजीव इतने बारीक होते हैं कि सुई की नोक पर करोड़ों की संख्या में आ जाते हैं। एजोटोबैक्टर, राइजोबियम, एजोस्पिरिलम, पोटैशियम मोबिलाइजिंग बैक्टीरिया और फॉस्फेट घुलनशील बैक्टीरिया, इन पांचों अलग प्रकार के सुयोग्य, सक्षम और अच्छी नस्ल (स्ट्रेन) के बैक्टीरिया को चिह्नित करना और उन्हें लैब में तैयार कराना काफी मुश्किल भरा काम रहा। 

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भारत विविधतापूर्ण जलवायु वाला देश है। हर तरह के पर्यावरण में ये जीव जीवित रह सकें, इसके लिए ऐसे बैक्टीरिया ही चिह्नित किए गए, जो 30 से 40 डिग्री सेल्सियस तापमान और पीएच 5 से 9 के बीच वाले एल्कलाइन या एसिडिक मिट्टी में भी आसानी से पल-बढ़ सकें। 

यह जैव उर्वरक एक अहम शोध साबित होने वाला है

एनबीआरआई के निदेशक डॉ. अजीत कुमार शासनी ने बताया कि उड़ीसा और मेघालय में भी इस जैव उर्वरक के शानदार परिणाम मिले हैं। फसलों की गुणवत्ता व किसानों की आय बढ़ाने के साथ ही टिकाऊ खेती और पर्यावरण संतुलन की दिशा में एनबीआरआई का यह जैव उर्वरक एक अहम शोध साबित होने वाला है। 
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