मंत्रिपरिषद विस्तार में जातीय संतुलन पर ध्यान केंद्रित करने के साथ भविष्य का इंतजाम करने का भी संकेत दे दिया है। ठाकुर व मुस्लिम चेहरों को तवज्जो देकर और यादवों की भागीदारी बढ़ाकर इनके बीच समाजवादी पार्टी की पकड़ व पहुंच बरकरार रखने की कोशिश की है।
परंपरागत यादव वोटों को साधने के साथ पिछड़ों का समीकरण बैठाने का प्रयास भी हुआ है। यही नहीं, आठ मंत्रियों की बर्खास्तगी, तीन मंत्रियों की विदाई और दो मंत्रियों की मृत्यु से मंत्रिपरिषद में आए सामाजिक असंतुलन को दुरुस्त करने का प्रयास भी किया गया है।
यह बात दीगर है कि अति पिछड़ों में तेली, बुर्झी, बढ़ई, नाई व भूमिहार जैसी जातियों का भागीदारी शून्य ही है। दलितों में कई जातियों को प्रतिनिधित्व नहीं मिल पाया है। पर, अभी दो मंत्रियों का कोटा बाकी है। हो सकता है कि सपा नेतृत्व आगे इस दिशा में काम करे।
जनवरी 2014 को हुए पिछले विस्तार के आधार पर विश्लेषण करें तो बर्खास्तगी, विदाई और मृत्यु से मंत्रिपरिषद में चार ठाकुर, दो ब्राह्मण, एक भूमिहार, दो एससी, एक यादव, एक कुर्मी और एक शाक्य कम हो गए थे।
अब जो 12 नए चेहरे शामिल किए गए हैं, उनमें दो ठाकुर, दो यादव, एक मुस्लिम, एक ब्राह्मण, एक निषाद, एक कुर्मी, दो दलित, एक सरदार और एक सैनी को शामिल करके मंत्रिपरिषद के जातीय अंसुतलन को ठीक करने की कोशिश की गई है।