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सोशल इंजीनियरिंग से सपा ने भविष्य पर लगाया दांव

Sun, 01 Nov 2015 01:13 AM IST
अखिलेश बाजपेयी/अमर उजाला, लखनऊ
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मंत्रिपरिषद विस्तार में जातीय संतुलन पर ध्यान केंद्रित करने के साथ भविष्य का इंतजाम करने का भी संकेत दे दिया है। ठाकुर व मुस्लिम चेहरों को तवज्जो देकर और यादवों की भागीदारी बढ़ाकर इनके बीच समाजवादी पार्टी की पकड़ व पहुंच बरकरार रखने की कोशिश की है।
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परंपरागत यादव वोटों को साधने के साथ पिछड़ों का समीकरण बैठाने का प्रयास भी हुआ है। यही नहीं, आठ मंत्रियों की बर्खास्तगी, तीन मंत्रियों की विदाई और दो मंत्रियों की मृत्यु से मंत्रिपरिषद में आए सामाजिक असंतुलन को दुरुस्त करने का प्रयास भी किया गया है।

यह बात दीगर है कि अति पिछड़ों में तेली, बुर्झी, बढ़ई, नाई व भूमिहार जैसी जातियों का भागीदारी शून्य ही है। दलितों में कई जातियों को प्रतिनिधित्व नहीं मिल पाया है। पर, अभी दो मंत्रियों का कोटा बाकी है। हो सकता है कि सपा नेतृत्व आगे इस दिशा में काम करे।
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जनवरी 2014 को हुए पिछले विस्तार के आधार पर विश्लेषण करें तो बर्खास्तगी, विदाई और मृत्यु से मंत्रिपरिषद में चार ठाकुर, दो ब्राह्मण, एक भूमिहार, दो एससी, एक यादव, एक कुर्मी और एक शाक्य कम हो गए थे।

अब जो 12 नए चेहरे शामिल किए गए हैं, उनमें दो ठाकुर, दो यादव, एक मुस्लिम, एक ब्राह्मण, एक निषाद, एक कुर्मी, दो दलित, एक सरदार और एक सैनी को शामिल करके मंत्रिपरिषद के जातीय अंसुतलन को ठीक करने की कोशिश की गई है।

हर वर्ग को संतुष्ट करने की कोशिश

पवन पांडेय को वापस लेकर ब्राह्मण भागीदारी को कुछ दुरुस्त किया गया है। हालांकि दो की जगह एक ब्राह्मण चेहरे को स्थान मिला है। एक स्थान पवन पांडेय के हटने से ही रिक्त हुआ था। दूसरी जगह शिवाकांत ओझा की बर्खास्तगी से खाली हुई थी।

जनवरी 2014 से तुलना करें तो चार की जगह दो ठाकुर चेहरे ही शामिल हो पाए हैं। पर, अरविंद सिंह गोप व विनोद सिंह उर्फ पंडित सिंह को कैबिनेट तो मूलचंद चौहान को स्वतंत्र प्रभार देकर क्षत्रियों को संतुष्ट रखने का प्रयास किया गया है।

ऐसा लगता है कि अंबिका के हटने से यादवों में कोई गलत संदेश न चला जाए इसलिए ओंकार सिंह यादव और शैलेन्द्र यादव उर्फ ललई को शामिल कर इस जाति को साधे रखने की कोशिश की गई है।

मनोज पारस व शिवकुमार बेरिया की विदाई से घटे दो दलितों के प्रतिनिधित्व को सुधीर कुमार रावत व बंशीधर बौद्ध को शामिल कर ठीक किया गया है।

हेमराज के रूप में भगवत शरण गंगवार की विदाई से कुर्मी वोटों की नाराजगी थामने का प्रयास हुआ है तो पप्पू निषाद को शामिल करके और रामसकल गुर्जर को स्वतंत्र प्रभार देकर अति पिछड़ों को और लुभाने का प्रयास हुआ है।
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भाजपा पर भी निशाना

बलवंत सिंह रामूवालिया के रूप में पहली बार केशधारी सरदार को प्रतिनिधित्व देकर आमतौर पर भाजपा के परंपरागत वोट माने जाने वाले सिखों को भी सपा की तरफ आकर्षित करने की कोशिश झलक रही है। साहब सिंह सैनी व निषाद को कैबिनेट मंत्री बनाकर भी सपा ने तय कर दिया है कि अति पिछड़ो पर उनकी नजरें इनायत हैं।

साथ ही, यह कोशिश भी की है कि भाजपा इस वर्ग को अपने पाले में न कर सके। साथ ही उन आरोपों का जवाब देने का प्रयास किया है कि सपा सिर्फ यादवों का ही ख्याल रखती है। चितरंजन स्वरूप की मृत्यु से मंत्रिपरिषद में घटे वैश्यों का प्रतिनिधित्व तो पूरा नहीं हो पाया है, लेकिन नितिन अग्रवाल को तरक्की देकर इसकी भरपाई करने की कोशिश हुई है।

यह है नए मंत्रिपरिषद का जातीय गणित
58--सदस्यीय मंत्रपरिषद, सीएम को मिलाकर
11--मुसलमान
10--यादव
9--ठाकुर
5--ब्राह्मण
4--कुर्मी

1--वैश्य
2--लोध
7--दलित
7--अति पिछड़े
1--सरदार
1--जाट
15--अगड़ी जाति के मंत्री (ठाकुर, ब्राह्मण व वैश्य)
24--पिछड़े व अति पिछड़े
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