2017 की चुनावी जंग जीतकर सत्ता में वापसी के लिए समाजवादी पार्टी ने संगठन के मोर्चे पर काम शुरू कर दिया है। प्रदेश ही नहीं, कई जिलों में टीम को नए तरीके से सजाया जाएगा।
सपा के रणनीतिकार चाहते हैं कि चुनाव के मद्देनजर संगठन और सरकार के ढांचे को थोड़ा अलग-अलग किया जाए ताकि दोनों मोर्चों पर पूरा फोकस रह सके। इसके तहत संगठन के मौजूदा स्वरूप को विस्तार देकर नए लोगों को समायोजित किया जा सकता है। वरिष्ठ मंत्री शिवपाल सिंह यादव को संगठन में अहम भूमिका दी जा सकती है।
सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव ने 2014 के लोकसभा चुनाव में हार के बाद प्रदेश अध्यक्ष को छोड़कर पूरी प्रदेश इकाई भंग कर दी थी। प्रदेश अध्यक्ष अखिलेश यादव ने 18 जनवरी 2015 को नई प्रदेश कार्यकारिणी की घोषणा की थी।
इसमें उपाध्यक्ष, महासचिव, कोषाध्यक्ष और प्रवक्ता का एक-एक पद रखा गया था। 21 सचिव और 47 कार्यकारिणी सदस्य बनाए गए थे। बाद में शिवपाल सिंह यादव को प्रमुख प्रवक्ता नामित किया गया और कार्यकारिणी में कुछ सदस्य जोड़े गए हैं।
इसके लिए मुलायम खुद कर रहे कवायदें
2017 के चुनावी समर के लिए इस टीम को और प्रभावी बनाने की तैयारी चल रही है। क्षेत्रीय व जातीय संतुलन को साधने के लिए कुछ प्रमुख नेताओं को प्रदेश इकाई में शामिल किया किया जा सकता है।
शिकायतों और परफॉरमेंस में कमी के आधार पर कुछ लोगों को हटाया जा सकता है। संगठन को चुस्त-दुरुस्त बनाने की कसरत खुद मुलायम सिंह कर रहे हैं।
लगातार बैठकें करके वे जिले से लेकर प्रदेश स्तर तक के नेताओं से फीडबैक लेते रहते हैं। वे नेताओं से मिलते हैं और उनसे टेलीफोन पर भी संपर्क स्थापित करते हैं।
बताया जा रहा है कि वे अखिलेश यादव, रामगोपाल यादव और शिवपाल यादव के साथ संगठन के कामकाज को लेकर शुरुआती चर्चा कर चुके हैं।
सरकार और संगठन के पास एक्टिव कामकाज के लिए एक साल का समय बचा है। इसके बाद चुनावी बिगुल बज जाएगा। सपा मुखिया चाहते हैं कि इस एक साल में जनता के हक में सरकार और संगठन का अधिकतम इस्तेमाल हो।
अखिलेश के लिए संभव नहीं है ये काम
आम तौर पर सभी बैठकों में सरकार और संगठन के बीच बेहतर तालमेल की शिकायतें रहती हैं। मुलायम के सामने जिलाध्यक्ष अपनी सुनवाई न होने का रोना रोते हैं।
ऐसी संभावना है कि शिवपाल यादव को संगठन में भूमिका देकर इस कमी को दूर किया जाए। अखिलेश यादव सपा के प्रदेश अध्यक्ष होने के साथ मुख्यमंत्री भी हैं। उनके लिए जिलाध्यक्षों से निरंतर संपर्क एवं संवाद बनाए रखना व्यावहारिक तौर पर संभव नहीं है।
कई बार तो जिलाध्यक्ष चाहकर भी प्रदेश अध्यक्ष से न तो बात कर पाते हैं और न मिल ही पाते हैं। वे सरकार तक अपनी बात पहुंचाने के लिए सपा मुखिया का सहारा लेते हैं।
ऐसे संकेत हैं कि शिवपाल को संगठन में ऐसी जिम्मेदारी दी जाए जिससे अखिलेश पर संगठन का बोझ कुछ हल्का हो और संगठन की बात सरकार तक आसानी से पहुंच सके। साथ ही पार्टी नेतृत्व का प्रदेश व जिलों की टीम से संवाद भी होता रहे।