प्रदेश सरकार ने पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह की जयंती पर
23 दिसंबर को सार्वजनिक अवकाश घोषित किया है। हालांकि बैंक व कोषागार खुले
रहेंगे। इस संबंध में सामान्य प्रशासन विभाग ने शासनादेश जारी कर दिया है।
हालांकि प्रदेश में छुट्टियों की राजनीति नई नहीं है। माना जा रहा है कि सपा सरकार ने इसके जरिये न केवल
मुजफ्फरनगर दंगे से नाराज चल रहे जाटों को मनाने की कोशिश की है।
बल्कि
किसान बिरादरी में भी संदेश देने का प्रयास किया है। चौधरी चरण सिंह की
जयंती 23 दिसंबर लंबे अरसे से किसान दिवस के रूप में मनाई जाती रही है,
लेकिन अवकाश घोषित नहीं किया गया।
अब चौधरी
चरण सिंह की जयंती पर छुट्टी का ऐलान करके सपा सरकार ने मुजफ्फरनगर दंगे
के बाद नाराज चल रहे जाटों को मनाने के लिए भावनात्मक दांव खेला है।
इस
घोषणा को आहत जाटों के जख्मों पर मरहम लगाने की कोशिश के तौर पर देखा जा
रहा है। सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव खुद को चौधरी चरण सिंह का राजनीतिक
उत्तराधिकारी बताते रहे हैं।
पहली बार मुख्यमंत्री बनने पर उन्होंने विधान
भवन के सामने चौधरी चरण सिंह की आदमकद प्रतिमा लगवाई। दूसरी बार
मुख्यमंत्री बने तो मेरठ विश्वविद्यालय का नामकरण चौधरी चरण सिंह के नाम पर
किया।
उनके नाम पर कई योजनाएं भी शुरू की र्गईं। गत 25 नवंबर को
मुख्यमंत्री मेरठ में मोउिद्दीनपुर चीनी मिल का शुभारंभ करने गए तो खुद को
चौधरी चरण सिंह का अनुयायी बताना नहीं भूले।
दरअसल
किसान बिरादरी, खास तौर से जाटों में चौधरी चरण सिंह का बड़ा सम्मान है।
इन दिनों जाट बिरादरी में सपा सरकार के प्रति नाराजगी है। दंगे को लेकर जाट
सरकार पर एकपक्षीय कार्रवाई का आरोप लगाते रहे हैं।
सपा नेतृत्व को इसका
एहसास है। चूंकि पश्चिमी यूपी के कई जिलों में राजनीति की दिशा तय करने में
जाट अहम भूमिका निभाते हैं, इसीलिए उन्हें मनाने की कोशिशें शुरू की गई
हैं।
कुछ दिन पहले ही चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय छात्रसंघ के पूर्व
अध्यक्ष कुलदीप उज्ज्वल को रिमोट सेंसिंग एप्लीकेशन सेंटर का चेयरमैन बनाकर
राज्यमंत्री का दर्जा दिया गया।
इससे पहले सपा सरकार पूर्व विधायक साहब
सिंह, पूर्व मंत्री अनुराधा चौधरी और मुकेश चौधरी को लालबत्ती दे चुकी है।
हालांकि, चौधरी साहब की जयंती पर अवकाश के फैसले से जाट बिरादरी की नाराजगी
कितनी दूर होती है, यह तो आने वाला वक्त बताएगा।