सपा सरकार ने चुनावी हार के लिए कुसूरवार माने गए मंत्रियों और पदाधिकारियों पर सख्त कार्रवाई के साफ संकेत दिए हैं।
इसमें अखिलेश सरकार के मंत्रियों से लेकर संगठन में अहम पदों पर तैनात लोग शामिल हो सकते हैं।
अखिलेश सरकार के कई मंत्रियों को लोकसभा चुनाव में करारी हार का सामना करना पड़ा है।
पहले दौर मे हार का ठीकरा उन पर फूटा है जिन्हें जातीय और क्षेत्रीय संतुलन बनाने के ख्याल से मंत्रीपद का दर्जा दिया गया था।
100 से ज्यादा नेता थे दर्जा प्राप्त मंत्री
लोकसभा चुनाव के मद्देनजर ही सौ से ज्यादा नेताओं को दर्जा प्राप्त मंत्री बनाया गया था। हाईकोर्ट ने भी इन नियुक्तियों को अवैध ठहराया था।
सुप्रीम कोर्ट ने इन्हें मंत्रिपरिषद के गठन के सिद्धांतों के खिलाफ बताया है। वजह अदालती आदेश हों या लोकसभा चुनाव में करारी हार, अखिलेश सरकार ने कई दिनों की अटकलों के बाद मंगलवार को 36 दर्जा प्राप्त मंत्रियों की छुट्टी कर दी।
नियमानुसार कोई भी सरकार 15 फीसदी से ज्यादा विधायकों को मंत्री नहीं बना सकती।
इसीलिए, रुतबे और पार्टी नेताओं की वीआईपी कल्चर की ललक शांत करने के लिए मंत्री या राज्यमंत्री का दर्जा देने का रास्ता निकाला गया।
बसपा सरकार के 18 जुलाई 2007 के आदेश का हवाला देकर सपा सरकार ने मनचाहे लोगों को दर्जा प्राप्त मंत्री बनाया।
हारे हुए नेताओं को बना दिया मंत्री
विधानसभा चुनाव में हारे हुए नेता हों, पूर्व विधायक, वरिष्ठ नेता या युवा संगठनों के पदाधिकारी, सभी को दर्जा प्राप्त मंत्री बनाया गया।
कई लोगों को राज्यमंत्री का दर्जा देकर चुनावों में भी उतारा गया। बिजनौर सीट से अनुराधा चौधरी का टिकट काटा तो अगले ही दिन विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग का अध्यक्ष बनाकर कैबिनेट मंत्री का रुतबा दे दिया।
प्रोन्नत होकर आईएएस बने तपन प्रसाद ने वीआरएस लेकर सपा में शामिल होने की घोषणा की तो कुछ ही दिन बाद उन्हें प्रशासनिक सुधार विभाग का सलाहकार बना दिया गया।
मेरठ शहर सीट से विधानसभा चुनाव हारे अय्यूब अंसारी को पर्यटन विभाग का सलाहकार बनाया गया।
शामली से विधानसभा चुनाव हारे वीरेन्द्र सिंह को उत्तर प्रदेश (पश्चिम) गन्ना एवं बीज विकास निगम का अध्यक्ष बनाकर राज्यमंत्री का दर्जा दिया गया।
इन मंत्रियों ने सरकार भी किरकिरी भी कराई है
दर्जाधारी मंत्रियों ने कई मौकों पर सरकार की फजीहत कराई है। एस्कोर्ट न मिलने पर कई दर्जा प्राप्त मंत्री हंगामा कर चुके हैं, अफसरों से भिड़ चुके हैं।
ताजा मामला श्रम एवं सेवायोजन विभाग के सलाहकार मो. अब्बास और खाद्य एवं आवश्यक वस्तु निगम के अध्यक्ष इकराम कुरैशी से जुड़ा है।
तहलका के स्टिंग आपरेशन में उन्हें ग्राम विकास अधिकारी पद पर नौकरी के लिए पैसे के लेनदेन की बातें करते दिखाया गया।
कैबिनेट दर्जा प्राप्त राज्य प्रमाणीकरण निगम के अध्यक्ष साहब सिंह सैनी पहली पत्नी रहते दूसरी शादी करने के आरोप में घिरे हैं।
कैबिनेट दर्जाधारी नरेन्द्र भाटी उस समय चर्चा में आए थे जब खनन का विरोध करने पर उन्होंने आईएएस अधिकारी दुर्गाशक्ति नागपाल को निलंबित करा दिया था।
मिलती हैं ये सुविधाएं
दर्जा प्राप्त मंत्रियों को सामाजिक, राजनीतिक रुतबे के साथ ही आर्थिक लाभ भी मिलते हैं। उन्हें 40 हजार रुपये मानदेय और राजधानी में दफ्तर और आवास की सुविधा दी जाती है।
आवास न लेने पर दस हजार रुपया भत्ता मिलता है। बैठकों या सरकारी टूर के लिए ट्रेन और हवाई जहाज से यात्रा की सुविधा मिलती है।
निजी सचिव, चपरासी की सुविधा भी है। कैबिनेट मंत्रियों की सुविधाएं राज्यमंत्री का दर्जा वालों से ज्यादा हैं।
इसके अलावा मेडिकल एलाउंस की सुविधा मिलती है। औसतन एक दर्जाधारी मंत्री पर महीने में एक लाख रुपये से ज्यादा खर्च होता है।
ओमवीर सिंह तोमर भी हटाए गए
लोकसभा चुनाव की घोषणा से पखवाड़ा भर रहे योजना आयोग के सलाहकार बनाए गए बागपत के ओमवीर सिंह तोमर ने ‘संघर्ष के सफर का नायक मुलायम’ पुस्तक लिखी।
इसका विमोचन इसी साल 19 जनवरी को उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी ने दिल्ली के विज्ञान भवन में किया था।
जौनपुर के सतेन्द्र उपाध्याय योजना आयोग में सलाहकार बनाए गए थे। तोमर के साथ ही उन्हें भी हटा दिया गया है।
मुजफ्फरनगर दंगे पर ये अपनाई रणनीति
मुजफ्फरनगर दंगे के बाद वेस्ट यूपी में खूब दर्जाधारी मंत्री बनाए गए। अकेले मेरठ जिले में चार नेताओं को राज्यमंत्री का दर्जा दिया गया।
इनमें तीन नेता मुस्लिम और एक जाट हैं। आसपास के जिलों में कई नेताओं को राज्यमंत्री दर्जे के पद दिए गए।
इसे मुजफ्फरनगर दंगे के बाद वोटों के समीकरण को साधने की रणनीति का हिस्सा माना गया। हालांकि जनता ने इसे आसानी से समझ लिया और सपा को इस लोकसभा चुनावों में सबक सिखा दिया।