बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय में 10 करोड़ रुपये से अधिक की लागत से ग्लोबल इंस्टीट्यूट ऑफ इंटरडिस्प्लिनरी स्टडीज इन संस्कृत एंड इंडिक लर्निंग की स्थापना की जाएगी।
संस्थान में संस्कृत का प्रयोग करके न सिर्फ कम्प्यूटर सॉफ्टवेयर डवलप किए जाएंगे बल्कि भारतीय पर्यटन और बिहेवियरल साइंसेज को भी बढ़ावा मिलेगा। संस्थान की स्थापना के लिए मंगलवार को विश्वविद्यालय में कुलपति की अध्यक्षता में पहली बैठक हुई।
कमेटी में सदस्य राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान के डॉ. पवन कुमार ने बताया कि इस संस्थान का उद्देश्य प्राचीन ज्ञान-विज्ञान को आधुनिक ज्ञान से प्रमाणित करके समाज को उसका लाभ उपलब्ध कराना होगा।
डॉ. पवन ने बताया कि संस्थान की स्थापना को लेकर तीन मुख्य बातें ध्यान में रखी गई हैं। धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा देना, कम्प्यूटर सॉफ्टवेयर डवलपमेंट और कॉग्निटिव एंड बिहेवियरल साइंस के अंतर्गत काउंसलिंग व थेरेपी की फील्ड में काम करके प्रमाणित परिणाम देना।
उन्होंने बताया कि संस्कृत ग्रामर कम्प्यूटर के लिए सबसे अच्छी भाषा है। इसकी सहायता से सॉफ्टवेयर डवलपमेंट किया जा सकता है। इस केंद्र में लैब्स की स्थापना भी की जाएगी जहां टेस्टिंग होगी।
धार्मिक पर्यटन को मिलेगा बढ़ावा
बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय
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डॉ. पवन ने बताया कि लखनऊ में इस केंद्र की स्थापना का बड़ा कारण यहां एसजीपीजीआई, कमांड अस्पताल जैसे संस्थान होना भी है। मनोविज्ञान के क्षेत्र में यदि प्राचीन पद्धतियों को इस्तेमाल किया जाए तो उसकी प्रमाणिकता इन संस्थानों में जांची जा सकती है।
पर्यटन पर बात करते हुए डॉ. पवन ने बताया कि भारत ‘लुक ईस्ट और एक्ट ईस्ट’ की पॉलिसी को भी अपनाता है। ताइवान, जापान, मलेशिया, श्रीलंका सहित बहुत से देश हैं जहां बौद्ध संस्कृति को अपनाया गया है।
ऐसे देशों के लिए भारत बड़ा धार्मिक स्थल है। बनारस, कुशीनगर जैसी जगहों पर इन देशों से पर्यटकों का काफी आना है। यहां के प्राचीन ग्रंथों में बहुत सी बातें छुपी हैं। सही जानकारी न मिलने से पर्यटक भ्रमित हो सकते हैं।
यह केंद्र सही जानकारी देने पर काम करेगा। इसके अलावा प्राचीन ग्रंथों में छिपी चिकित्सकीय पद्धति, इंजीनियरिंग विद्या, योग के मनोवैज्ञानिक पहलू पर काम होगा।