बहुजन समाज पार्टी एक बार फिर ‘दलित संग पिछड़ों’ के एजेंडे पर वापसी करती नजर आ रही है।
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दरअसल पार्टी ने विधानसभा व लोकसभा चुनावों में करारी हार के बाद अपने सोशल इंजीनियरिंग के फॉर्मूले को पूरी तरह से दरकिनार कर दिया है।
पार्टी सुप्रीमो मायावती ने बसपा संगठन का जो नया ढांचा तैयार किया है उसमें ब्राह्मणों व मुसलमानों की जगह दलितों में गैर जाटव व पिछड़ों में अति पिछड़ों पर फोकस किया गया है।
फॉर्मूले में फेल हुईं मायावती
लोकसभा चुनाव में एक भी सीट न जीत पाने के बाद मायावती ने पहली प्रतिक्रिया में जब यह कहा था कि चुनाव में बार-बार उनके समझाने के बावजूद सवर्ण, मुस्लिम व पिछड़ा समाज गुमराह हो गया, जिससे पार्टी एक भी सीट नहीं जीत सकी।
संकेत साफ था कि सोशल इंजीनियरिंग के जिस फॉर्मूले के गुणा-भाग पर उनकी उम्मीदें टिकी थीं, वह फेल हो गई है।
लिहाजा अब वह आगे उस पर बढ़ने को तैयार नहीं हैं। 20 से 23 मई तक हार के कारणों की संगठन के लोगों के साथ समीक्षा और संगठन के नए सिरे से गठन में इसकी छाप साफ नजर आई।
बसपा संगठन में पदाधिकारी बनाने से लेकर विधायक, सांसद का टिकट दिलाने तक में जिन जोन कोऑर्डिनेटरों की अहम भूमिका होती है, मायावती ने उस टीम में एक भी ब्राह्मण चेहरा शामिल नहीं किया है।
बाबू सिंह कुशवाहा ने बिगाड़ा खेल
पार्टी के मुस्लिम चेहरा नसीमुद्दीन सिद्दीकी और मौजूदा एमएलसी अतहर खां व नौशाद अली ही अपने स्थान बना सके हैं। निवर्तमान कोऑर्डिनेटर मुनकाद अली तक यूपी में जगह नहीं ले पाए।
इसके उलट गैर जाटव व अति पिछड़ों से तमाम नए लोगों को जोड़ा गया है। करीब एक दर्जन से ज्यादा जिलों में नए जिलाध्यक्ष बनाए गए हैं। उसमें गैर जाटव व कुछ पिछड़े चेहरों को तवज्जो मिली है।
पूर्व मंत्री बाबू सिंह कुशवाहा पार्टी में अति पिछड़ा वर्ग के मुख्य चेहरा माने जाते थे। एनआरएचएम घोटाले में घिरकर बसपा से बाहर होने के बाद पार्टी का इस वर्ग पर फोकस कम हो गया था।
अब पार्टी इस ओर लौटती नजर आ रही है। इसके अलावा, बसपा को लेकर दलितों के बीच जाटव व गैर जाटव की खाईं गहरा चुकी है। नए सांगठनिक ढांचे में गैर जाटव को भी महत्व देकर मायावती ने इस खाईं को पाटने की कोशिश की है।
और चौंकाने वाले 2017 के नतीजे
दरअसल दलितों में यह बात घर कर चुकी है कि बसपा में दलित वोटों की पूंजी को सोशल इंजीनियरिंग के नाम पर सवर्ण व मुस्लिम प्रत्याशियों को ट्रांसफर करने का काम हो रहा है।
ऐसे लोग कुछ अपने समूह का व बाकी दलितों का वोट लेकर पावर में आए तो भ्रष्ट रास्ते अपनाए। यूपी में बसपा शासनकाल में ऐसे चेहरे सामने आ चुके हैं।
दलितों को कुछ नहीं मिला। नतीजतन इस बार 20 से 25 फीसदी दलित भाजपा में चले गए। इस हकीकत को बिना समझे जो भी रणनीति बनेगी, कारगर नहीं होगी।
2012 की रणनीति से 2017 की रणनीति में कोई खास फर्क नजर नहीं आ रहा। ऐसे में 2017 के चुनाव नतीजे बसपा के लिए और चौंकाने वाले होंगे। -अशोक कुमार भारती चेयरमैन नेशनल कन्फेडरेशन ऑफ दलित आर्गनाइजेशन
मायावती ने संगठन को पुनर्गठित करते हुए गैर जाटव व अति पिछड़ों को जोड़ने की कोशिश की है, यह भी अच्छा संकेत है। लेकिन सर्व समाज को जोड़े बगैर सत्ता मिलनी आसान नहीं है।
जिस फार्मूले पर वह लौटती नजर आ रही हैं, उस पर बसपा पहले भी काम कर चुकी है। पर, कभी नतीजे के निकट तक नहीं पहुंच सकी। ऐसे में संगठन में भी सोशल इंजीनियरिंग होनी चाहिए न कि केवल टिकट बांटने में।
बसपा में कोऑर्डिनेटर ही नाक-कान-आंख माने जाते हैं। जो नए कोऑर्डिनेटर बनाए गए उसमें इस समाज के नाम नजर नहीं आते हैं। मुस्लिमों की संख्या भी कम है।
दूसरा, युवाओं को जोड़ने के लिहाज से कोई संकेत नहीं मिला है, जबकि इसके लिए अलग से प्रयास होने चाहिए। लिहाजा 2017 विधानसभा चुनाव में वापसी के लिए पार्टी को अभी काफी कुछ करने की जरूरत है। - डॉ. गोपाल प्रसाद, एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. हरिजी सिंह गौर केंद्रीय विश्वविद्यालय सागर मध्यप्रदेश