प्रियंका ने संभाली थी पूरी चुनावी बागडोर
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भले ही कांग्रेस ने नामांकन के अंतिम दिन किशोरी लाल शर्मा को प्रत्याशी बनाया हो लेकिन, पार्टी ने ठोस रणनीति के तहत काम किया। अमेठी के मतदाताओं के मन में भाजपा के प्रति नाराजगी को हथियार बनाया। भाजपा के ऐसे नेताओं पर ध्यान रखा जो उपेक्षित थे। सबसे बड़ी रणनीति यह रही कि प्रत्याशी को लेकर अंतिम समय तक भाजपा को उलझाए रखा। अंदर ही अंदर तैयारी चलती रही। वहीं, स्मृति ईरानी हरेक सभा में खुद ही कांग्रेस पर हमलावर रहकर उसे चर्चा में बनाए रखा। इसके इतर राहुल हों या प्रियंका गांधी, प्रचार के दौरान दोनों ने लोगों को भावनात्मक तौर पर जोड़ा। बचपन की यादों को साझा किया। पिता राजीव गांधी की शहादत को याद किया। केएल शर्मा ने खुद को गांधी परिवार का सिपाही बताकर कांग्रेसियों को एकजुट कर लिया। योजना के तहत महज 17 दिन में ही केएल शर्मा ने पूरी बाजी पलट दी। हर जगह बस वह एक बात कहते नजर आए कि यह चुनाव हम नहीं, अमेठी की जनता लड़ रही है।
क्या कहते हैं विशेषज्ञ
आरआरपीजी कॉलेज के समाजशास्त्र विभाग के अध्यक्ष डॉ. धनंजय कहते हैं कि यह बात तो सही है कि अमेठी की पहचान गांधी परिवार से होने के फैक्टर ने काम किया लेकिन, कई और कारण हैं जिन्होंने कांग्रेस की जीत आसान की। जैसे धर्म का मुद्दा नहीं चल सका, जातीय मतों का ध्रुवीकरण रोकने में भाजपा सफल नहीं हो सकी। संविधान हो या मंगलसूत्र, विपक्ष के इन मुद्दों पर भाजपा सफाई देती नजर आई लेकिन, वह अपना कोई विजन नहीं ला सकी। स्थानीय स्तर पर भी कई कारण रहे, जैसे चुनिंदा नेताओं को तरजीह देना और कार्यकर्ताओं की उपेक्षा।