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आजम-मुलायम में फिर तलाक की नौबत

Fri, 13 Sep 2013 11:35 AM IST
मनोज श्रीवास्तव/लखनऊ
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मुगले आजम या फिर थोड़ी मान-मनौव्वल के बाद बेलगाम तरीके से सरकार में काम करने की आजादी।
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अब सबकी निगाहें इसी बात पर टिकी हैं कि आजम खां कौन सा रास्ता चुनते हैं। जख्म सहते हुए लाल बत्ती बचाए रखना आजम की फितरत में शामिल नहीं है।

सरकार में रहकर आजम ने जौहर विश्वविद्यालय को अल्पसंख्यक संस्थान का दर्जा दिलाकर सपना पूरा कर लिया है।

इतिहास पुरूष बनने की महत्वाकांक्षा आजम में जब-तब उछाल मारा करती है इसलिए कयास यही लगाया जा है कि सरकार का अहम हिस्सा बनने के बजाय किसी मुस्लिम सवाल पर शहीदाना अंदाज में सरकार से अलग होना ज्यादा पसंद करेंगे।

मुद्दा मुजफ्फरनगर कांड भी हो सकता है। आजम उस मसौदे को मुद्दा बना सकते हैं जिस पर उन्होंने अपनी सपा में वापसी के समय मुलायम सिंह से सहमति बनवाई थी।

हालांकि पहले रामगोपाल यादव, नरेश अग्रवाल और अबू आसिम आजमी द्वारा हमला फिर खुद नरम रुख दिखाकर मुलायम ने साफ कर दिया अगर आजम अपना अड़ियलपन छोड़ यस मैन की तरह काम करें तो ठीक अन्यथा रुख साफ है।
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अगर मुलायम अपनी इस रणनीति में कामयाब होते हैं तो इसे उनका राजनीतिक कौशल ही कहा जाएगा। पर माना यही जा रहा है कि पानी नाक के काफी ऊपर निकल गया है।

दरअसल लगातार आठ कैबिनेट बैठकों में गैरहाजिर रहने और आगरा में हुई सपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में न पहुंचने के बाद यह पुख्ता हो गया था कि आजम और यादव परिवार के बीच मतभेद ज्यादा गहरा गए हैं।

कार्यकारिणी की क्लोजडोर मीटिंग में नरेश अग्रवाल और अबू आसिम आजमी के हमले के बाद अन्य लोग सपा नेतृत्व का मूड भांप गए थे।

आजम सहित सबको अहसास है कि बिना मुलायम सिंह यादव की सहमति के ये लोग मुंह नहीं खोल सकते हैं। कहा यही जा रहा है कि नरेश, रामगोपाल और अबू आसिम और पार्टी के बाहर अहमद बुखारी जैसे लोगों के तीर सहते हुए आजम लाल बत्ती लेना शायद ही पसंद करें।

दरअसल आजम और यादव परिवार के बीच मतभेद विधानसभा चुनाव के समय ही वजूद में आ गये थे। चुनाव में बहुमत मिलने के बाद जैसे ही अखिलेश का नाम मुख्यमंत्री के लिए उछला, आजम ने त्योरियां चढ़ा लीं।

जैसे-तैसे मुलायम सिंह ने बरसों पुराने अपने रिश्तों की जज्बाती दुहाई देकर उन्हें अखिलेश के नाम पर राजी तो कर लिया पर आजम को अखिलेश के अंडर में काम करने का फैसला गले नहीं उतरा।

जब-तब उनकी बेचैनी संयमित तरीके से ध्वनित भी हो ही जाती थी। आजम के मिजाज को मुलायम बखूबी समझते हैं, जानते थे कि आने वाले दिनों में इगो क्लैश हो सकता है।

सो सरकार गठन के समय उन्होंने आजम के सामने विधानसभा अध्यक्ष बनने का प्रस्ताव रखा जिसे आजम ने निष्ठुरता से ठुकरा दिया। मुलायम ने उस समय तो आजम की जिद स्वीकार कर ली पर मन में किर्च जरूर बनी रही।

भोपाल के मुनव्वर सलीम (आजम के बेहद करीबी) के राज्यसभा सदस्य बनाए जाने पर जामा मस्जिद के इमाम अहमद बुखारी से हुई तीखी बयानबाजी के दौरान पार्टी से आजम का गिला-शिकवा पहली बार सार्वजनिक हुआ।

आजम ने कहा कि अहमद बुखारी से उनकी तल्खी पार्टी को लेकर हुई पर अफसोस, पार्टी का एक भी शख्स उनके साथ खड़ा नहीं दिखाई पड़ा। जाहिर है आजम का इशारा यादव परिवार की तरफ था।

तल्खी तब और गहरा गई जब मुलायम ने आजम को विश्वास में लिए बिना अहमद बुखारी के दामाद को विधान परिषद का सदस्य बनवा दिया। जिस अहमद बुखारी ने आजम और मुनव्वर सलीम की काफी लानत-मलामत की थी उसको मुलायम का अपने घर बुलाना भी आजम को रास नहीं आया।

हाल ही में अयोध्या में 84 कोसी परिक्रमा के सिलसिले में विहिप नेता अशोक सिंघल व कुछ संतों की मुलायम और अखिलेश के साथ मीटिंग पर सपा के मुस्लिम नेताओं में फुसफुसाहट थी पर नेताजी पर कौन सवाल उठाए।

पर आजम को यह मुलाकात तनिक भी रास नहीं आई। एतराज तो सपा के तमाम मुस्लिम नेताओं को था पर अकेले आजम ने ही इस पर एतराज जताया। दरअसल आजम भविष्य की आहट सूंघ रहे थे।

कहा यही जा रहा है कि भविष्य में उनकी कौमी सियासत पर सवाल न उठे और यह तोहमत न लगे कि सरकार में जाने के बाद वह मुस्लिम सवालों को भूल गए इसलिए पेशबंदी के तौर पर उन्होंने सिंघल-मुलायम व अखिलेश मुलाकात पर सवाल उठाया है। साथ ही वह अपने समथकों को यह भी संकेत देना चाह रहे थे कि वह मुलायम सिंह के हर फैसले के अंधसमर्थक नहीं हैं।

इस बीच यह भी सुना यह जा रहा है कि जल्द ही राजा भैया के साथ अहमद बुखारी के दामाद को भी मंत्री बनाया जा रहा है। हो सकता है कि आजम पर दबाव बनाने के लिए ऐसी चर्चा कराई जा रही हो पर ऐसा हुआ तो निश्चित ही सरकार का यह फैसला आजम को चिढ़ाने वाला होगा।

आजम को कोई चिढ़ाए और वह खामोश रहें, यह उनकी फितरत में शामिल नहीं। एक मुस्लिम विधायक ने कहा कि नेताजी आजम का मतलब पिछले लोकसभा चुनाव में समझ चुके हैं।

इसके बावजूद वह उनकी तुनकमिजाजी को और सहने को तैयार नहीं हैं। पर नेताजी को भी समझना चाहिए कि उपेक्षित रहकर पार्टी में या पार्टी के बाहर खामोश जिंदगी जीना भी आजम की फितरत में शामिल नहीं है ।

विभिन्न मुद्दों पर आजम का एतराज इस तरह रहा है-
1-अखिलेश का मुख्यमंत्री के तौर पर पेश किया जाना
-आजम मुलायम को मुख्यमंत्री बनाए जाने के पक्षधर, काफी मान मनौव्वल के बाद भारी मन से राजी हुए

2-मुलायम द्वारा स्पीकर बनने की पेशकश
-निष्ठुरता से ठुकराया। कहा कि इतना धैर्यवान नहीं कि कागज के गोले फेंके जाने पर सहता रहूं। कागज के गोले फेंके जाने पर मैं तो पेपरवेट फेंक कर मार दूंगा।
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3-धुर विरोधी अहमद बुखारी के दामाद उमर को विधान परिषद का सदस्य बनाए जाने पर
-कहा कि जो व्यक्ति 80 फीसदी मुस्लिम आबादी वाले क्षेत्र से चुनाव नहीं जीत सका उसको परिषद का प्रत्याशी बनाने का क्या औचित्य। उमर को टिकट मिल जाने पर कहा कि परिषद प्रत्याशी तय करने में उनकी सलाह नहीं ली गई।

4-84 कोसी परिक्रमा के मसले पर मुलायम-अखिलेश की विहिप नेता सिंघल व अन्य संतों से मुलाकात पर
-कहा कि जो लोग बाबरी मस्जिद की शहादत के दोषी हैं, उनसे मुलाकात करने का क्या औचित्य

5-रामपुर से लोकसभा चुनाव लड़ने की मुलायम की पेशकश पर
-कहा कि मैं विधायक ही ठीक, किसी अन्य को लड़ाएं
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