लखनऊ। टेढ़े पैरों का इलाज समय पर जरूरी है। इलाज में देरी होने पर चलने में परेशानी, पैर में दर्द और रोजमर्रा के कामों में दिक्कत हो सकती है। इस समस्या में केवल पैर सीधा करना ही काफी नहीं है। ये जानकारी केजीएमयू के पीडियाट्रिक ऑर्थोपैडिक्स विभाग के पूर्व अध्यक्ष व सैफई स्थित उत्तर प्रदेश आयुर्विज्ञान विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. अजय सिंह ने दी।
रविवार को पीडियाट्रिक ऑर्थोपैडिक्स विभाग में क्लबफुट पर आयोजित कार्यशाला में डॉ. सिंह ने बताया कि इलाज के बाद भी नियमित निगरानी जरूरी है, क्योंकि पैर दोबारा मुड़ सकता है। वहीं बच्चे की विकृति को लेकर परिजन तनाव में रहते हैं। ऐसे में परिवार को सही जानकारी देना भी इलाज का अहम हिस्सा है।
डॉ. अजय सिंह ने बताया कि क्लबफुट जन्मजात विकृति हो सकती है। समय पर इलाज मिलने पर पैर को सीधा किया जा सकता है। बच्चा सामान्य तरीके से चल सकता है। केजीएमयू के पीडियाट्रिक ऑर्थोपैडिक्स विभाग के अध्यक्ष डॉ. विकास वर्मा ने कहा कि मेडिकल कॉलेजों और जिला अस्पतालों में बच्चों की हड्डियों से जुड़ी बीमारियों के इलाज की सुविधाएं बढ़ानी चाहिए। क्लबफुट की जल्द पहचान और इसके कारणों पर शोध भी जरूरी है।
डॉ. विकास वर्मा ने कहा कि क्लबफुट सबसे आम जन्मजात हड्डी संबंधी विकृतियों में से एक है। पोनसेटी तकनीक में पैर को धीरे-धीरे सही स्थिति में लाने के लिए विशेष तरीके से प्लास्टर चढ़ाए जाते हैं। आयोजन सचिव डॉ. सुरेश चंद व डॉ. सैयद फैसल अफाक ने कहा कि कुछ बच्चों में एड़ी के पास की कड़ी नस को छोटा-सा चीरा लगाकर ढीला करना पड़ सकता है। इसके बाद पैर को दोबारा मुड़ने से बचाने के लिए निर्धारित अवधि तक विशेष जूते और पट्टी वाले उपकरण का इस्तेमाल जरूरी होता है।