नाश्ता नहीं करना, देर रात तक जागना, मोबाइल या लैपटॉप के जरिये चैटिंग...यह सब बच्चों को मानसिक रोग की ओर ले जा रहा है।
इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टॉक्सिकोलॉजी रिसर्च में इंडियन एकेडमी ऑफ न्यूरो साइंसेस और इंटरनेशनल ब्रेन रिसर्च ऑर्गेनाइजेशन के सहयोग से शुक्रवार को आयोजित ग्लोबल न्यूरोसाइंस एडवोकेसी प्रोग्राम में न्यूरोलॉजिस्ट और मनोविज्ञानियों ने अपने अध्ययन पेश कर इस बढ़ते खतरे के प्रति आगाह किया।
विशेषज्ञों ने कहा कि हालात जिस तरीके से हैं उससे बच्चा मानसिक रोगी तो होगा ही। राजधानी की प्रमुख न्यूरोलॉजिस्ट्स डॉ. डॉ. देविका नाग बढ़ते खतरे की तस्वीर अपने अध्ययन के जरिये पेश करती है। वे बताती हैं- मानसिक परेशानियां लेकर मेरे पास लाए गए 968 बच्चों पर मैंने एक छोटा सा अध्ययन किया।
उनसे पूछा कि वे नाश्ता क्या करते हैं? जवाब मिला, अधिकतर बिना कुछ खाए घर से निकलते हैं तो कुछ कुरकुरे, नूडल्स जैसी चीजें खा रहे हैं। स्कूल में भूख लगती है तो कैंटीन में समोसा या वैसा ही कुछ खा लिया। दूसरा सवाल किया, ‘सोते कितने घंटे हैं?’ जवाब मिला-दो से तीन घंटे।
रात को मोबाइल या किसी दूसरे डिवाइस पर दोस्तों से चैटिंग और नेट सर्फिंग करते हैं और सोने में रात के तीन बजना सामान्य बात है। सुबह छह बजे जागना होता है क्योंकि स्कूल का टाइम होता है।
बच्चों को पोषण नहीं मिल रहा है, वो पूरी नींद नहीं ले रहे हैं। इन हालात में कोई भी मानसिक रोगी हो जाएगा। डॉ. देविका के मुताबिक जो हालात हैं उसका परिणाम भविष्य में बढ़ती हुई दिमागी बीमारियों के रूप में देखने को मिलेगा।
लेकिन खतरा सिर्फ भविष्य में नहीं आएगा। खतरा आ चुका है, बच्चों की आत्महत्याओं से लेकर हिंसा की घटनाएं इसी का संकेत दे रही हैं।
केजीएमयू के मनोचिकित्सा विभागाध्यक्ष प्रो. पीके दलाल ने बताया कि उनके पास बड़ी संख्या में ऐसे बच्चे और किशोर लाए जा रहे हैं जो सोशल मीडिया और इंटरनेट के जबरदस्त एडिक्ट हो चुके हैं। उन्होंने कहा कि यह बहुत ही अजीब स्थिति है जहां तकनीक की वजह से बच्चों के दिमाग पर असर हो रहा है।