नेताजी के साथ परिवार की छोटी बहू अपर्णा यादव को मंच पर लाकर शिवपाल ने यह संदेश देने में भी कामयाबी हासिल कर ली कि अखिलेश यादव ने भले ही उन्हें अलग कर दिया हो लेकिन न तो नेताजी ने नाता तोड़ा और न पूरे परिवार ने। इस तरह शिवपाल ने प्रदेश में सपा के वोट बैंक में सबसे ज्यादा अहम माने जाने वाले यादवों तथा मुसलमानों को यह समझाने की कोशिश की कि उनकी पार्टी भी नेताजी के विचारों की एक धारा है। इसमें शामिल होने पर वही समीकरण बनेंगे जो सपा के साथ बनते। शिवपाल के इस संदेश को मंच पर मौजूद मुलायम के पुराने साथी और स्व. हरमोहन सिंह यादव के पुत्र सांसद सुखराम सिंह यादव और पूर्व सांसद भगवती सिंह की मौजूदगी ने और मजबूती दे दी।
रैली के सहारे शिवपाल ने भतीजे अखिलेश यादव का नाम लिए बिना उनके सामने बड़ी रैली करने की चुनौती पेश कर दी। भाजपा पर हमला बोलकर और मंदिर मुद्दे पर 1990 व 1992 की याद दिलाकर उन्होंने मुसलमानों को यह संदेश देने का प्रयास किया कि उन्हें भाजपा की बी टीम बताने वाले गलत बोल रहे हैं। मुलायम की तरह वह भी मुस्लिम सरोकारों और उनके हितों के पैरोकार हैं। भीड़ जुटाकर उन्होंने भाजपा नेतृत्व को भी नसीहत देने की कोशिश की है कि वह उन्हें हल्का न समझे। वह इतनी हैसियत रखते हैं कि बात भी करोगे तो बराबरी पर होगी। इसी के साथ उन्होंने प्रदेश में गठबंधन करने वालों को भी आगाह किया है कि उनकी अनदेखी करके काम नहीं चलेगा। खासतौर से उन्होंने मंच से रैली में बड़ी संख्या में दलितों और अल्पसंख्यकों के आने की बात कहकर बसपा को इशारों ही इशारों में संदेश देने की कोशिश की कि वह अखिलेश यादव से कमजोर नहीं हैं। गठबंधन करने वालों ने अगर उन्हें हल्के में लिया तो गठबंधन के गणित को वह बिगाड़कर रख देंगे।