माज की हत्या के आरोपी व एंटी ह्यूमन ट्रैफिक सेल के तत्कालीन प्रभारी इंस्पेक्टर संजय राय ने पुलिस और कोर्ट को गुमराह करने के लिए कई पैंतरे आजमाए थे। उसने माज़ हत्याकांड की साजिश रचने के लिए अपने नौकर रामबाबू उर्फ छोटू का हाथ बताया।
शातिर संजय राय का कहना था कि नौकर को वह अपने परिवार के सदस्य की तरह मानता था। उनका मोबाइल फोन छोटू के पास ही रहता था जिसका उसने फायदा उठाया और विश्वासघात किया। हालांकि, विवेचना के दौरान उसकी यह कहानी ताश के पत्तों की तरह ढह गई।
पुलिस को संजय राय और छोटू के मोबाइल फोन की पड़ताल में शूटरों से बातचीत का ब्यौरा मिला था। इस बाबत संजय राय से पूछताछ की गई तो अपनी गर्दन बचाने के लिए उसने नौकर छोटू पर ठीकरा फोड़ दिया था।
शूटरों से हुई बातचीत में छोटू के नंबर से कई कॉल थीं जबकि संजय राय के नंबर से कम बार कॉल की गई थी। संजय राय ने बताया कि मोबाइल फोन छोटू के पास रहता था। अपने फोन के साथ ही छोटू ने उसका फोन भी इस्तेमाल किया होगा।
संजय का कहना था कि छोटू ने ही माज़ की हत्या की साजिश रची और शूटरों से बातचीत की थी। शातिर इंस्पेक्टर का कहना था कि शूटरों को सुपारी के 20 हजार रुपये भी छोटू ने अपने हाथों से दिए थे।
उसने पुलिस से कहा था कि हत्या छोटू ने कराई अथवा किसी ने हत्या कराने में उसे इस्तेमाल किया। हालांकि, कोर्ट में जिरह के दौरान उसकी यह कहानी तार-तार हो गई। खुलासा हुआ कि संजय राय शूटरों से संपर्क करने के लिए छोटू का मोबाइल फोन इस्तेमाल करता था।
एंटी ह्यूमन ट्रैफिकिंग सेल के प्रभारी रहे संजय राय ने प्रशिक्षु दरोगा के दोस्त अकमल को फंसाने के लिए हत्याकांड की साजिश रची थी। गाजीपुर थाना प्रभारी के पद पर तैनाती के दौरान संजय राय को प्रशिक्षु दरोगा से प्रेम हो गया था।
उधर, प्रशिक्षु दरोगा की अकमल से दोस्ती हो गई। यह दोस्ती संजय राय को चुभने लगी। उसने प्रशिक्षु दरोगा को पाने और अकमल को रास्ते से हटाने के लिए साजिश रची। इस साजिश में वह काफी हद तक कामयाब भी हो गया था। पुलिस ने अकमल पर नजर रखनी शुरू कर दी। हालांकि, काफी जांच-पड़ताल के बाद भी माज़ की हत्या में उसकी भूमिका सामने नहीं आई।
माज़ की हत्या के तार खंगाल रही पुलिस को संजय राय के मोबाइल फोन की कॉल डिटेल से असली कहानी का पता चला था। संजय की कॉल डिटेल में प्रशिक्षु दरोगा का नंबर मिला। उक्त नंबर पर संजय राय की रोज घंटों बातचीत सामने आई थी।
अधिकारियों का कहना है कि संजय राय जब गाजीपुर थाना प्रभारी था, तब प्रशिक्षु दरोगा के संपर्क में आया। उसने ही प्रशिक्षु दरोगा को मृतक आश्रित कोटे से पुलिस महकमे में नौकरी दिलाने में मदद की थी। इसके बाद दोनों में दोस्ती हुई और बातचीत होने लगी।
हाईकोर्ट से हासिल किया था बहाली का आदेश
माज़ की हत्या में नाम आने के बाद संजय राय फरार हो गया। तत्कालीन एसएसपी जे. रविंद्र गौड ने उसकी तलाश में वाराणसी, जौनपुर, गोरखपुर, आजमगढ़ समेत कई जनपदों में पुलिस टीम भेजी, लेकिन उसका पता नहीं चला।
करीब दो महीने पुलिस को छकाने के बाद 15 जुलाई को संजय राय ने कोर्ट में सरेंडर कर दिया था। जेल जाने के बाद उसे सेवा से बर्खास्त कर दिया गया था। हालांकि, उसने हाईकोर्ट से अपनी बहाली के आदेश करा लिए। बाद में यूपी पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट में अर्जी देकर हाईकोर्ट के आदेश पर स्टे ले लिया था।
पत्रावली के अनुसार, वादिनी हुस्न बानो ने इंदिरानगर थाने पर 29 मई 2013 को रिपोर्ट दर्ज कराई थी कि रात साढ़े 10 बजे उसका 14 वर्षीय भतीजा माज अहमद सिद्दीकी घर के अंदर बिस्तर पर बैठ कर टीवी देख रहा था, उसी समय तीन लोग मोटरसाइकिल से सवार होकर आए और आवाज देकर घर का दरवाजा खुलवाया, जिस पर दूसरे भतीजे फैजान ने जैसे ही दरवाजा खोला, तीनों लोग घर में घुस आए और माज पर ताबड़तोड़ गोलियां चला कर उसे घायल कर दिया और भाग गए।
माज को ट्रॉमा सेंटर ले जाया गया, जहां उसे मृत घोषित कर दिया गया। रिपोर्ट में इस हत्याकांड को अंजाम देने के लिए भकामऊ निवासी फहीम के साले आरिफ और उसके घरवालों पर शंका व्यक्त की गई थी।
वहीं, जब मामले की विवेचना की गई तो पुलिस को पता चला कि तत्कालीन पुलिस इंस्पेक्टर संजय राय ने वादिनी की पुत्री के प्रेम में असफल होने पर इस हत्या की साजिश रची थी और शूटरों से हत्या कराई थी। इस मामले की सुनवाई के दौरान एक आरोपी अजीत यादव फरार हो गया था। लिहाजा कोर्ट ने उसकी पत्रावली को अन्य आरोपियों से अलग कर मामले की सुनवाई की।