लखनऊ में गोमती रिवर फ्रंट परियोजना में करोड़ों के घपले की अब तक हुई जांच पर ही सवाल उठ रहे हैं। प्रोजेक्ट पर पैसे लुटाने वाले अफसरों का जांच रिपोर्ट में जिक्र तक नहीं किया गया है। यही वजह है कि अधिकारियों के बीच से ही अब मामले की नए सिरे से जांच की मांग उठ रही है।
गोमती रिवर फ्रंट विकसित करने के लिए तत्कालीन सीएम अखिलेश यादव ने 4 नवंबर 2014 को आदेश जारी किया था। इस पर 4 फरवरी 2015 को मुख्य अभियंता समिति की बैठक में 747 करोड़ रुपये का प्रोजेक्ट अनुमोदित किया गया।
इसके बाद 16 फरवरी 2015 को तत्कालीन प्रमुख सचिव, वित्त की अध्यक्षता में हुई व्यय वित्त समिति की बैठक में इस राशि को घटाकर 656 करोड़ कर दिया गया।
शुरुआत में इस प्रोजेक्ट में 16.2 किलोमीटर की डायफ्रॉम वॉल, नदी के किनारे विकास और बैराज व पुलों पर प्रकाश की व्यवस्था शामिल की गई थी। उसके बाद एस्टीमेट में समय-समय पर एक के बाद एक कई संशोधन किए गए और अखिलेश सरकार के कार्यकाल में ही परियोजना लागत 1513 करोड़ रुपये पहुंच गई।
इतना ही नहीं योगी सरकार बनते ही इस प्रोजेक्ट के लिए अफसरों ने 900 करोड़ की और मांग कर डाली। इस पर सीएम योगी आदित्यनाथ ने सख्त रुख अपनाया। वह न सिर्फ मौका मुआयना करने गए, बल्कि वहां से लौटते ही मामले की न्यायिक जांच के आदेश दे दिए।
नियम-कायदे रख दिए ताक पर
गोमती रिवर फ्रंट
- फोटो : amar ujala
मामले के जानकारों का कहना है कि एस्टीमेट में किए गए बदलावों पर 26 अगस्त 2014 को जारी शासनादेश के आधार पर विचार करना चाहिए था। इस शासनादेश में साफ कहा गया है कि 25 करोड़ रुपये से अधिक खर्च के प्रस्तावों के औचित्य पर प्रमुख सचिव, वित्त की अध्यक्षता में गठित व्यय वित्त समिति ही निर्णय लेगी।
25 करोड़ रुपये से अधिक की पुनरीक्षित लागत होने की दशा में प्रस्ताव व्यय वित्त समिति के सामने अवश्य ही रखा जाएगा। इसके अलावा 25 करोड़ रुपये तक के प्रस्तावों पर विभागीय मंत्री से अनुमोदन लेना जरूरी होगा। 25 करोड़ से अधिक और 100 करोड़ रुपये तक के प्रस्तावों पर विभागीय मंत्री के साथ-साथ वित्त मंत्री का अनुमोदन, 100 करोड़ रुपये से अधिक और 200 करोड़ रुपये तक के प्रस्तावों पर मुख्यमंत्री का अनुमोदन और 200 करोड़ रुपये से अधिक के प्रस्तावों पर कैबिनेट का अनुमोदन लेना अनिवार्य है।
यहां बता दें कि प्रमुख सचिव, वित्त की अध्यक्षता में गठित व्यय वित्त समिति में कुल सात सदस्य होते हैं, इसके अनुमोदन पर ही गोमती रिवर फ्रंट परियोजना में व्यय की बढ़ोत्तरी के प्रस्ताव आगे बढ़े।
एक मुख्य सचिव जिम्मेदार, दूसरा पाक साफ
गोमती रिवर फ्रंट
- फोटो : amar ujala
लेकिन, जांच रिपोर्ट में प्रशासकीय विभाग यानी सिंचाई विभाग के तत्कालीन प्रमुख सचिव और मुख्य अभियंता के अलावा व्यय वित्त समिति के किसी भी सदस्य को जिम्मेदार नहीं ठहराया गया है।
जबकि, नियम-कायदे कहते हैं कि व्यय वित्त समिति इसकी जिम्मेदारी से बच नहीं सकती। इसी तरह से 656 करोड़ रुपये एक मुख्य सचिव के कार्यकाल में और 781 करोड़ रुपये (पुनरीक्षित लागत) दूसरे मुख्य सचिव के कार्यकाल में जारी हुए।
रिपोर्ट में पहले को तो जिम्मेदार ठहराया गया है, पर दूसरे के बारे में कोई टिप्पणी नहीं की गई है। अगर अनुश्रवण समिति के अध्यक्ष होने के नाते कोई एक मुख्य सचिव इस घपले के लिए जिम्मेदार है, तो दूसरे मुख्य सचिव अपने कार्यकाल में हुए अंधाधुंध व्यय के लिए जिम्मेदार क्यों नहीं।
यह सवाल भी अफसरों के बीच बना हुआ है। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि जांच रिपोर्ट में इतने छेद हैं कि तकनीकी मामलों की जानकारी न रखने वाला आम आदमी भी इन्हें आसानी से पकड़ ले रहा है।