लखनऊ। आज शुभ दीप जलावो सब…, काहे मान करो सखी री… जैसे गीतों की पंक्तियां को आवाज दी कोलकाता से आईं पटियाला घराने की शास्त्रीय गायिका कौशिकी चक्रवर्ती ने। संगीत नाटक अकादमी का परिसर उनके सुरों से गूंज उठा। मौका था अकादमी के स्थापना दिवस पर आयोजित धरोहर कार्यक्रम का।
मंच पर एक तरफ कौशिकी थीं, साथ दे रहे थे उनके बेटे ऋषित देसीकन। वहीं सामने श्रोता दीर्घा में मौजूद थीं मुख्य अतिथि पद्मश्री मालिनी अवस्थी, वीसी भातखंडे प्रो. मांडवी सिंह समेत सुधी श्रोता व गणमान्य नागरिक। इस दौरान मुख्यमंत्री के सलाहकार अवनीश अवस्थी, प्रमुख सचिव संस्कृति विभाग मुकेश मेश्राम और समाज कल्याण के प्रमुख सचिव डॉ. हरिओम, और निदेशक अकदमी डाॅ. शोभित नाहर की मौजूदगी भी खास रही।
ख्याल से लेकर ठुमरी तक...को प्रभावी व खूबसूरत अंदाज में पेश करने वाली कौशिकी चक्रवर्ती पद्मभूषण पंडित अजॉय चक्रवर्ती की बेटी हैं। उन्होंने राग श्याम कल्याण से कार्यक्रम की शुरुआत की। राग मधुवंती में काहे मान को सखी री अब... सुनाया। सिलसिला लंबा चला और श्रोता सुरों की लड़ियों से बंधते चले गए।
शास्त्रीय संगीत का कोई कार्यक्रम खाली न जाए
कार्यक्रम के दौरान लोगों का उत्साह देखकर कौशिकी चक्रवर्ती ने कहा कि वह संगीत के छात्र के तौर पर गुजारिश करना चाहती हैं कि, लखनऊ यह प्रयास करे कि कोई भी ऑडिटोरियम हो, वह चाहे कितना ही बड़ा क्यों न हो, पर वह शास्त्रीय संगीत के नाम से भरना चाहिए।
अकादमी में प्रवेश के लिए टिकट, कितना तर्कसंगत!
निसंदेह धरोहर की प्रस्तुति बहुत खास रही। पर एक सवाल लगातार बना है कि अपने ही स्थापना दिवस के जश्न में टिकट लगाना कितना तर्कसंगत है। इसे लेकर शहर के कलाकारों के मन में कई सवाल भी हैं। वरिष्ठ रंगकर्मी गोपाल सिन्हा कहते हैं कि 20 या 50 रुपये की बात नहीं। धरोहर जैसे आयोजनों में टिकट लगाना तार्किक नहीं लगता है। बीते दिनों धरोहर कार्यक्रम की प्रेसवार्ता में जब अमर उजाला संवाददाता ने सवाल किया तो वरिष्ठ अधिकारियों का तर्क था कि सीटें रिजर्व रहें, किसी को खड़े न रहना पड़े, इसी आधार पर ये व्यवस्था की है। इस पर शहर के कलाकारों का कहना है कि टिकट यदि सीटें रिजर्व रखने के लिए हैं तो पास क्यों बांटे गए।