अभी ज्यादा दिन नहीं हुए जब कुछ कार्यक्रमों में राज्यपाल राम नाईक और मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के बीच एक अलग किस्म का सौहार्द देखा गया।
एक विश्वविद्यालय के कार्यक्रम में तो सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह ने राज्यपाल की जमकर तारीफ की।
पर, सपा के राष्ट्रीय अधिवेशन में जिस तरह राज्यपाल की भूमिका पर चर्चा हुई उससे प्रदेश सरकार और राजभवन के रिश्तों की इस सहजता के खत्म होने की आशंका जताई जा रही है।
अधिवेशन के दौरान पेश राजनीतिक प्रस्ताव में राज्यपाल के पद की जरूरत पर सवाल उठाए जाने के बाद राजभवन की ओर से प्रतिक्रिया स्वाभाविक मानी जा रही है। फिलहाल राजभवन इस पर मौन दिख रहा है।
सियासी हलकों में चर्चा है कि राज्यपाल राम नाईक की सक्रियता सपा सरकार को रास नहीं आ रही है।
शुरू हुआ विवादों का नया अध्याय
अधिवेशन में राज्यपाल को लेकर नेताओं की तल्ख टिप्पणियों को जहां दबाव की सियासत के रूप में देखा जा रहा है वहीं इसे सरकार और राजभवन के बीच विवादों के नए अध्याय की शुरुआत भी माना जा रहा है।
सपा के रुख को देखते हुए आने वाले दिनों में सरकार और राजभवन के बीच तल्खी और बढ़ सकती है।
वैसे भी अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष को कैबिनेट मंत्री का दर्जा देने संबंधी अध्यादेश को रोकने तथा शकुंतला मिश्रा पुनर्वास विश्वविद्यालय का नाम बदलने संबंधी अध्यादेश को लेकर राज्यपाल की नसीहतें सपा सरकार को नागवार गुजरीं।
...तो क्या कानून व्यवस्था है वजह?
लोकायुक्त की रिपोर्टों पर सरकार की चुप्पी पर राजभवन का जवाब तलब भी सपा को काफी अखरा।
गाहे-बगाहे सूबे की कानून-व्यवस्था को लेकर राज्यपाल की चिंता प्रदेश सरकार के लिए असहज स्थिति पैदा कर रही है।
ऐसे में सपा ने राज्यपाल पर निशाना साधकर राजभवन पर दबाव बनाने का दांव चल दिया है।
अधिवेशन में सपा के राष्ट्रीय महासचिव प्रो. राम गोपाल यादव व नरेश अग्रवाल ने जिस अंदाज में संवैधानिक संस्थाओं को अपनी मर्यादा में रहने की चेतावनी देते हुए दो-दो हाथ करने तक की बात कही उसकी गूंज कही न कहीं राजभवन तक पहुंची है।
राज्यपाल ने दवाब में न आने के दिये संकेत
हालांकि राज्यपाल ने इस पर किसी तरह की टिप्पणी करने से इन्कार कर दिया लेकिन इतना संकेत जरूर दे दिया कि किसी दबाव में वे अपने संवैधानिक दायित्वों के निर्वहन से पीछे हटने वाले नहीं हैं।
शुक्रवार को राज्यपाल ने इलाहाबाद में कानून व्यवस्था पर चिंता जताकर इरादे साफ कर दिए।
टकराव का इतिहास पुराना
यूपी में सरकार और राजभवन के बीच रिश्तों में कड़वाहट नई नहीं है।
21 फरवरी 1998 को तत्कालीन राज्यपाल रोमेश भंडारी ने कल्याण सिंह के नेतृत्व वाली सरकार को बर्खास्त कर आनन-फानन में जगदंबिका पाल को मुख्यमंत्री पद की शपथ भी दिला दी।
कल्याण सिंह ने राज्यपाल के इस फैसले को इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती दी। 23 फरवरी 1998 को हाईकोर्ट ने राज्यपाल के फैसले को असंवैधानिक बताया।
इसके बाद पाल को इस्तीफा देना पड़ा और कल्याण सिंह फिर से मुख्यमंत्री बन गए। इस घटना के बाद राज्यपाल रोमेश भंडारी की कार्रवाई पर सवाल उठे और उन्हें पद छोड़ना पड़ा।
इसी तरह टीवी राजेश्वर के मुलायम और मायावती सरकार से रिश्ते भी बहुत सहज नहीं रहे।
जौहर विश्वविद्यालय संबंधी विधेयक को मंजूरी न दिए जाने को लेकर राजेश्वर और मुलायम सिंह सरकार के बीच विवाद खड़ा हुआ।
वहीं मायावती के शासनकाल में सूचना का अधिकार कानून के मामले में राज्यपाल राजेश्वर के संज्ञान में लाए बिना उनके नाम पर जारी एक अधिसूचना को लेकर राज्य सरकार और राजभवन के बीच टकराव की स्थिति पैदा हुई।