यहां पर भाजपा के पक्ष में मोदी लहर की तो बात की जाती है, पर जाति समीकरण मुद्दों पर हावी हैं। देखें क्या है सलेमपुर सीट का सच? पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के गांव इब्राहिमपट्टी में विद्युत पारेषण केंद्र की स्थापना होने के बाद भी क्षेत्र के बाशिंदों को बिजली के लिए रोना पड़ता है।
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सड़कें ऐसी खस्ताहाल हैं कि जरा सा चूकने पर दुर्घटना का शिकार होने का खतरा बना रहता है। और तो और पीने का साफ पानी तक सबको मयस्सर नहीं है।
बावजूद इसके ये समस्याएं पहले की तरह इस बार भी लोकसभा चुनाव में मुद्दा नहीं बनीं। चुनाव आता है, प्रत्याशी मैदान में उतरते हैं और इलाके का संपूर्ण विकास कराने के वादे कर चुनाव जीतने के बाद फिर कभी झांकने नहीं आते।
बसपा सांसद रमाशंकर विद्यार्थी लोगों की उम्मीदों पर खरे नहीं उतरे। बहरहाल पार्टी ने उनका टिकट काट दिया। सलेमपुर संसदीय क्षेत्र का गठन पांच विधानसभा क्षेत्रों को मिलाकर हुआ है।
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नहीं मिला जनप्रतिनिधि
सलेमपुर बिल्थरारोड, सिकंदरपुर और बांसडीह प्रशासनिक तौर पर बलिया जिले से जुड़े हैं तो सलेमपुर और भाटापार रानी क्षेत्र देवरिया जिले पड़ते हैं। लिहाजा पूरे संसदीय क्षेत्र में बुनियादी सुविधाओं के लिए दो जिलों के अफसरों का सहयोग हासिल करना किसी चुनौती से कम नहीं है।
भाटापार रानी के पन्नालाल कहते हैं कि इस तरह की चुनौती से पार पाने के लिए मशक्कत करने वाला कोई जनप्रतिनिधि अब तक तो नहीं मिला, फिर सुविधाओं का विस्तार कैसे होता।
कई प्रातों को जोड़ने वाली घाघरा नदी पर महज दस साल पहले बने भागलपुर पुल पर भारी वाहनों का आवागमन प्रतिबंधित कर दिया गया है। कारण, पुल में दरारें पड़ गई हैं।
इलाके में हर साल आने वाली बाढ़ व सूखा से निपटने की ठोस योजना कोई पेश नहीं करता है। जनता बदहाल सड़कों, बिजली संकट और पेयजल की समस्या से बेहाल है, लेकिन ये सब चीजें चुनावी मुद्दे नहीं बन रहे। कोई भी प्रत्याशी इन मुद्दों को शिद्दत से नहीं उठा रहा है।
सबके लिए है मौका
जातीय समीकरणों को साधने की जुगत सलेमपुर में भले ही जनता के मुद्दे गायब हों पर हर कोई अपनी पार्टी के मुखिया को प्रधानमंत्री बनवाने के नाम पर वोट जरूर मांग रहा है।
दलों का पूरा जोर जातीय समीकरण फिट करने पर है। प्रत्याशियों का जोर अपनी जाति की गोलबंदी के साथ ही अन्य जातियों को साधने पर ही है। कुल मिलाकर यहां लड़ाई भाजपा, कांग्रेस, सपा और बसपा के बीच चतुष्कोणीय नजर आ रही है।
रविशंकर सिंह पप्पू (बसपा) दादा पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के प्रभाव व विधान परिषद सदस्य के रूप में कराए गए कार्य। पार्टी के वोट बैंक के साथ स्वजातीय मतदाताओं की गोलबंदी से उम्मीद।
डॉ. भोला पांडेय (कांग्रेस) पार्टी के बड़े नेता के रूप में पहचान। केंद्र सरकार की जनकल्याणकारी योजनाओं को भुनाने की कोशिश।
भाजपा को मोदी लहर से आस
हरिवंश सहाय (सपा) सपा सरकार की उपलब्धियों को भुनाने की कोशिश। पार्टी का वोट बैंक।
रवींद्र कुशवाहा (भाजपा) क्षेत्र के चार बार सांसद रह चुके पिता हरिकेवल प्रसाद कुशवाहा के संबंधों का फायदा मिलने की उम्मीद। स्वजातीय मतदाताओं की बड़ी संख्या के साथ मोदी लहर से आस।
ओम प्रकाश राजभर (बसपा) लंबे समय से क्षेत्र में जनता के बीच सक्रिय। स्वजातीय लोगों और एकता मंच के घटक दलों के समर्थकों का सहारा।
चंद्र प्रताप सिंह (आप) बढ़ती महंगाई, कानून व्यवस्था की गिरती हालत को लेकर केंद्र और प्रदेश सरकार से नाखुशी को भुनाने की कोशिश।