यूपी के राजनीतिक गलियारे और प्रशासनिक गलियों में आज तीन किस्से काफी चर्चा में रहे। चाहे-अनचाहे आखिर ये बाहर आ ही जाते हैं। इन्हें रोकने की हर कोशिश नाकाम होती है। आज की कड़ी में 'माफिया का आशीर्वाद साहबों पर' की कहानी। इसके अलावा 'ज्ञानी नीरे राखिए, निवेश बढ़ता जाए...' और 'कुर्सी के डगमगाने की आहट' के किस्से भी चर्चा में रहे। आगे पढ़ें, नई कानाफूसी...
एक ऐसा प्रधान है, जिस पर पहले अफसरों ने कृपा बरसाई। फिर उसकी कृपा अफसरों पर बरसी। बड़े-बड़े धन्नासेठों से लेकर साहबों को जेब में रखने वाले इस माफिया का जलवा इस कदर है कि इसके नाम की गाड़ियां बेधड़क सड़कों पर दौड़ती हैं।
एमओयू के खेल भी निराले होते हैं। खुद को अरबपति दिखाने की हसरत एक बार स्टेट गेस्ट बनने का सुख पाकर ही पूरी हो जाती है। कौड़ियों की हैसियत वाले तिकड़मबाज आईएएस अफसरों को चकमा देकर यह आनंद उठा ही लेते हैं। अब कौन समझाए कि इनकी नब्ज तो पेशेवर ही भांप सकते हैं।
नियम बनाने वाले भला कंपनियों के मायाजाल और मनी ट्रेल की तिकड़मों को कहां जांच पाएंगे। यदि इस काम के लिए कुछ धुरंधर आईआरएस अफसर भी केंद्र से मांग लिए जाएं तो दुनिया भर में फजीहत झेलने की जगह निवेश की इमारत मजबूत होगी। एक अनुभवी ब्यूरोक्रेट ने इसे यूं समझाया कि, 'ज्ञानी नीरे राखिए, निवेश बढ़ता जाए...
प्रदेश के एक कमिश्नरेट के मुखिया काफी बेचैन और परेशान है क्योंकि उनकी कुर्सी के डगमगाने की आहट उनको हो गई है। चर्चा है वहां जो पहले साहब तैनात थे, वह अभी भी हस्तक्षेप कर रहे हैं लेकिन वर्तमान वाले उनकी सुन नहीं रहे। इसलिए पुराने वाले इनकी कुर्सी हिलाने में जुटे हैं।